Saturday, June 20, 2009

The Young Leaders of Indian American Physicians.

A commentary on the annual convention of AAPI held in Disney Dolphin Resort at Disney World in Orlando, Fl., USA during 11-14 June, 2009, published in the special supplement of South Asian Times.

The most impressive thing was the venue of the 27th annual convention of American Association of Physicians of Indian Origin-the tall building of Disney Dolphin resort overlooked a manicured lawn that spread around a huge man made lake. A boat frequented the pier picking up hotel guests to Epcot center and the nearby board walk.

For a visitor the twin hotel complex is gateway to Central Florida’s theme parks and attractions. ‘Entertainment architecture’ has been the central theme of the Walt Disney’s Swan and Dolphin hotels. It seems that the designers of this place kept in mind that the theme of the structures outside the boundaries of the Disney property should embody the same fantasy and sense of story as the structure in the park.

An ever smiling outgoing president of AAPI, Sanku Rao, greeted us. While we were still holding our luggage in the lobby, he invited us to a reception in one of the hotel suits. The incoming president Dr. Vinod Shah made a presentation about a letter he was planning to submit to President Obama. His colleagues in AAPI’s executive board looked very impressed. The aesthetically produced document graphically illustrated the theme of ‘yes, we can’, the mantra of President Obama’s election campaign as well as excerpts from his books, ‘Audacity of Hope’, and ‘The Dreams of my father’.

The letter was a well produced book of printed pages with plenty of photographs graphically integrated on the pages of the book. Dr. Shah wrote about poor compensation doctor received for their services. The letter highlighted the great shortage of doctors in this country. Dr. Shah advised the government to allow residency to the applicant doctors of Indian origin. Addressing the delegates at the convention, he said that thousands of such applicants were eagerly awaiting permission to start residency program in USA. “Out of 37,000 Indian students who applied for residency only 21,000 were given permission.

It is commendable how forcefully Dr. Shah demanded to allow more applicants in the residency program. I am sure the President’s representatives took note of the concerns of AAPI.
After the reception we were invited to a dinner at the board walk. The boulevard was full of tourists. We boarded a boat that dropped us at the board walk. Walking aimlessly from one end to the other, we finally spotted a sign that said ‘Welcome to AAPI’. As soon as we entered the hall we were treated with sumptuous Indian dinner. The caterer Jyoti Soni had put a lot of creativity to work while designing and presenting Indian dishes during the four days of the convention.


We met the legendary figure in Classical Indian music, Pundit Jasraj in the lobby. It was a rare occasion to meet the great vocalist in person. Raising his hands he returned our greeting. Though Bollywood music dominated the entertainment scene at the convention AAPI leadership reflected thoughtfulness by inviting Pundit ji.

A grand exhibition was inaugurated the next day. Considering the medical professionals of the Indian American community as rich and resourceful, a number of jewelry designers and business owners expected brisk sale. So did garment traders from India. Many of them were disappointed at the low turnover. I was also attracted to a number of booths that belonged to non profit organizations. Professionals like investors, pharmaceutical companies representatives were also present hoping to promote their products.

Air India offered an attractive discount of $250 for registered members of AAPI for travel to India. Announcing this gesture at the concluding function, Air India’s Executive Director for Americas, Chitra Sarkar, said Air India enjoyed an emotional bond with the Indian American medical fraternity who migrated many decades ago from India to settle in USA. “They remained loyal to us as they moved up in their career and prospered in a distant land. It is now our turn to translate this feeling of emotional attachment with our long time customers into loyalty.”

The young physicians made their presence in more ways than one. They organized their own seminars and addressed a number of questions faced by upcoming doctors in the process of establishing their practice. I found that the participants were very keen to sort out problems arising out of electronic record keeping requirement of the US government. The physicians were informed about benefit and incentives that the government was offering to doctors who were switching to electronic record keeping.

It did not take long to realize that the younger generation of physicians, unlike their parents, had different aspirations as they grew up and educated in mainstream America.

The young physicians are an asset for the organization and can help boost its membership. It was evident that AAPI was at a cross road to strengthen its strategies with more emphasis on how to turn itself in to a meaningful organization relevant to the needs of the younger physicians.

Like most Indians, physicians love Bollywood music too. It was amazing to see middle aged doctors and their wives swinging to the tune of Bollywood’s popular singer Sunidhi Chauhan. As my friend, Sudhir Vyas told me: ‘The times have changed, Ashok! So has the popular Indian music. There may not be new lyrics but the new generation is hooked to remixed songs of olden days that Sunidhi was performing for the elder generation of doctors’.

Monday, May 25, 2009

क्यूबा में बहने लगी नई बयार

नवभारत टाईम्स, २ मई:
अमेरिका के दक्षिणी प्रदेश फ्लोरिडा के कीवेस्ट द्वीप से लगभग एक सौ मील दूर बसा क्यूबा
पिछली आधी शताब्दी से अमेरिकी विदेश नीति की वर्ण व्यवस्था में अछूत की तरह खड़ा है। दोनों देशों के बीच 1961 से ही कोई कूटनीतिक संपर्क नहीं है। फिदेल कास्त्रो की साम्यवादी तानाशाही के कारण क्यूबा से विस्थापित होकर अमेरिका और खासकर मियामी शहर में बसे लाखों आप्रवासी अपनी मातृभूमि जाने से वंचित थे। उन्हें यह भी छूट हासिल नहीं थी कि वे अपने परिवार वालों को पैसे भेज सकें, जैसा कि अमेरिका के ज्यादातर आप्रवासी करते हैं। अमेरिका ने क्यूबा पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे थे। पर 13 अप्रैल से इस स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आ गया है। असल में बराक ओबामा ने घोषणा की है कि अब से क्यूबा मूल के आप्रवासी न सिर्फ अपनी मातृभूमि की यात्रा कर सकते हैं, बल्कि अपने परिवार को पैसे भी भेज सकते हैं। इससे क्यूबा मूल के वे आप्रवासी बेहद प्रसन्न हैं, जिनके परिवार के सदस्य क्यूबा में हैं।

क्यूबा के अप्रवासियों के लिए अपने देश में पैसा भेजने की छूट एक बड़ी सुविधा है। अमेरिका में रहने वाले फिदेल कास्त्रो के घोर विरोधी क्यूबावासी कास्त्रो को दंडित करने की मांग वर्षों से करते आ रहे थे, लेकिन अब वे ओबामा की नई नीति का खुल कर स्वागत कर रहे हैं।

ओबामा के इस फैसले से 2004 में भूतपूर्व राष्ट्रपति बुश द्वारा लगाई गई आर्थिक नाकाबंदी ढीली पड़ गई है। इससे दोनों देशों के बीच नया दौर तो शुरू हुआ ही है, अमेरिका और दक्षिण के गरीब देशों को यह संदेश भी मिला है कि वॉशिंगटन दक्षिण के गैर पूंजीवादी देशों के साथ तनाव कम करना चाहता है और उनके साथ अच्छे पड़ोसी का व्यवहार करना चाहता है। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का रवैया मोहल्ले के उस दादा की तरह था, जो अपने पड़ोसियों को धमकाता रहता है। ग्रेनाडा में अमेरिकी सैनिकों को भेजने की रोनाल्ड रेगन की नीति और पनामा के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर मियामी की जेल में कैद करने का कदम ऐसी ही नीति का अंग था। अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अमेरिकी-महादेश के किसी भी कोने में बेरोकटोक सैनिक कार्रवाई करता रहा है।
बुश के शासनकाल में मेक्सिको सहित तमाम दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ अमेरिका की नीति में बेहद तनाव आ गया था। फिदेल कास्त्रो के सबसे बड़े प्रशंसक बन कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्युगो चावेज अमेरिका को चुनौती दे रहे थे। ब्राजील के लोकप्रिय राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा अमेरिका के बदले भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के ज्यादा नजदीक जा रहे थे। अमेरिका में मेक्सिको से आए अनधिकृत अप्रवासियों के साथ बुरा सलूक किए जाने के कारण मेक्सिको-अमेरिका के बीच भी तनाव काफी बढ़ गया था।
क्यूबा के प्रति अमेरिकी रुख में बदलाव ओबामा की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग है, जिसे वे अपने चुनाव प्रचार के दौरान रेखांकित कर चुके हैं। दुनिया के अमेरिका-विरोधियों से मुंह न मोड़ कर उनके साथ बात करने की नीति को वे कमजोरी नहीं मानते। 9/11 के बाद बुश की नीतियों से दुनिया भर में अमेरिका की छवि धूमिल हुई है, इस छवि को ओबामा सुधारना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि दुनिया अमेरिका को एक सहयोगी राष्ट्र के रूप में देखे, न कि एक ऐसे ताकतवर देश की तरह जो अपनी बात मनवाने के लिए जबरदस्ती करता रहता है।
अमेरिका और क्यूबा के बीच कड़वाहट का इतिहास साठ साल से भी ज्यादा पुराना है। 1959 में फिदेल कास्त्रो ने क्रांतिकारी विद्रोह की ताकत से देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली। लेनिन और मार्क्स की विचारधारा से प्रेरित कास्त्रो ने निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और अमेरिकी आयात पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए। संबंध इतने खराब हो गए कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने क्यूबा पर स्थायी प्रतिबंध (अम्बर्गो) लगाने की घोषणा कर दी।
सन 1962 के उन दिनों में क्यूबा में सोवियत मिसाइल लगाने के सवाल पर सोवियत राष्ट्रपति ख्रुश्चेव और अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनडी के बीच टकराव इस हद तक पहुंच गया था कि उसका अंजाम तीसरे विश्व युद्ध के रूप में हो सकता था। आणविक हथियारों से लैस दुनिया की दो महाशक्तियां एक दूसरे की चाल का जवाब देने के लिए तैयार थीं। अमेरिका की खुफिया एजंसियों ने खबर दी कि सोवियत संघ ने क्यूबा की धरती पर न्यूक्लियर मिसाइल स्थापित कर दी है तो अमेरिकी विदेश विभाग ने क्यूबा पर आक्रमण करने की सलाह राष्ट्रपति कैनडी को दी। लेकिन धैर्य और कूटनीति का सहारा लेते हुए कैनेडी ने क्यूबा की नौसैनिक घेरेबंदी का निर्णय किया, जिसके एक सप्ताह बाद ही ख्रुश्चेव को मिसाइल हटा लेने की घोषणा करनी पड़ी।
तब से फिदेल कास्त्रो और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते ही चले गए। कास्त्रो ने अमेरिका को साम्राज्यवादी देश कहकर सोवियत रूस कैंप में शरण ली, तो सीआईए ने कास्त्रो को मार डालने के लिए क्यूबन आप्रवासियों के गिरोह हवाना भेजने से लेकर कास्त्रो के लिए सिगार में विस्फोटक डालने तक की साजिश रची। लेकिन कास्त्रो अभी तक जिंदा हैं और अब देश का शासन उन्होंने अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप रखा है।
फिलहाल ओबामा के लचीलेपन की नीति का अर्थ सिर्फ इतना है कि वे हवाना को बताना चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर बनाने की अगली पहल क्यूबा को करनी होगी। अमेरिका चाहता है कि क्यूबा लोकतंत्र का रास्ता पकडे़। वहां राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए और मानवाधिकारों का उल्लंघन बंद हो। एक जमाने में क्यूबा अमेरिका की आंख की किरकिरी था। आज हालात बदल चुके हैं। कास्त्रो सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं। सोवियत संघ बिखर चुका है। क्यूबा अपनी गरीबी का बोझ झेलने के काबिल नहीं। वह अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्त होना चाहता है।
अमेरिका के लिए क्यूबा से अधिक महत्वपूर्ण दूसरे मुद्दे हैं। वह चावेज को काबू में करना चाहता है और कोलंबिया से मेक्सिको तक फैले नशीले पदार्थों के विशाल साम्राज्य को समाप्त करना चाहता है। इसके लिए ओबामा इन देशों से टकराव के बदले उनका सहयोग लेना बेहतर समझते हैं।

मानवता के हत्यारों से क्या सबक लें?

प्रभात ख़बर में प्रकाशित:

तीस वर्ष पहले दक्षिण पूर्व एशिया के देश कम्बोडिया में नरसंहार का नंगा नाच हो रहा था. चीन के सहयोग से सत्ता में आयी ख्मेर रुज शासकों ने साम्यवाद स्थापित करने का आसान तरीका खोज निकला था. पोल पोट के नेतृत्व में न केवल देश की राजधानी नोम पेन्ह खली कराई गयी बल्कि शिक्षक से लेकर डॉक्टर तक देश के पढ़े लिखे लोगों की पूरी आबादी को सिलसिलेवार ढंग से मौत के घाट उतारने का कार्यक्रम १९७५ से ले कर १९७९ तक चलता रहा. इन चार वर्षों में सत्रह लाख लोग या तो मार दिए गए या लेबर कैंप में भूख, बिमारी से उनकी मौत हो गयी.
इतिहास बताता है कि साठ के दशक में वियतनाम में अमेरिका ने साम्यवाद से लड़ने के लिए जो युद्ध छेड़ा था उसका उपसंहार कम्बोडिया में हुआ जहाँ साम्यवाद के नाम पर लाखों लोगों की बलि चढाई गयी. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे भयंकर नर संहार था जिसे रोकने की कोशिश युनाइटेड नेशन्स सहित दुनिया के किसी देश ने नहीं किया. नब्बे के दशक में रवांडा और बोस्निया में भी ऐसा ही नर संहार हुआ जिसे होने देने के लिए युनाइटेड नेशन्स के सदस्य देश जिम्मेदार हैं. बहरहाल, यहाँ चर्चा सिर्फ कम्बोडिया की:
नब्बे के दशक में ही युनाइटेड नेशन्स की पहल पर कम्बोडिया में साझे की सरकार बनी जिसमे ख्मेर रुज से अलग होकर कई नेता सत्ता में आ गए. खेमर रुज के कातिल नेता वर्षो तक जँगलों में छिपे रहे. लम्बे समय तक आना कानी के बाद कम्बोडिया के नेता कातिलों पर मुक़दमा चलने के लिए सहमत हुए. खेमर रुज के चार बड़े नेता जेल में डाले गए जिनपर अब जाकर मुक़दमा शुरू हुआ है.
गत ३० मार्च को जिस खेमर रुज नेता पर मुक़दमा शुरू हुआ उसका नाम है kaing Guek Eav जिसे डोइक (Duch) के नाम से जाना जाता है. ६६ वर्षीय डोइक पर १४ हज़ार लोगों को क्रूरता पूर्वक मौत के घाट उतारने का आरोप है जिसके लिए उसपर मानवता के खिलाफ अपराध करने का मामला चलाया जा रहा है. १९७९ में वियतनाम ने कम्बोडिया पर आक्रमण किया तब डोइक जँगलों में भाग गया और १९९७ तक क्रिस्चियन मिसनरी में नाम बदल कर शिक्षक बन कर काम करता रहा. ब्रिटिश लेखक निक डनलप ने डोइक का पता लगाया और उससे मुलाकात का ब्यौरा अपनी पुस्तक, 'द लोस्ट एक्सेकुशनेर' (The lost executioner) में प्रकाशित किया. उस मुलाकात में डोइक नें अपना अपराध कबूल किया था और कम्बोडिया की जनता से माफ़ी मांगी थी.
एक बार फिर डोइक नें अमानवीय अपराधिक अदालत में कबूल किया है कि उसने अपने बड़े अधिकारियों के आदेश पर काम किया. "अगर में कैदियों को मारता नहीं तो मुझे ही मार डाला जाता", उसका बयान है.
सामूहिक नरसंहार करने वाले हत्यारे या यातना देने वालों को जब कठघरे में खडा होने का समय आता है तो वे अपने को निर्दोष साबित करने के लिए एक ही तर्क देते हैं: मैं तो सिर्फ आदेश का पालन कर रहा था.
जर्मनी के नाजी हों या बोस्निया और रवांडा के सैनिक, सभी अपने को भुक्तभोगी साबित करने के लिए कोई कसार नहीं छोड़ते. वे अपने आपको उनकी श्रेणी में रखने की कोशिश करते हैं जिन पर उन्होंने जुल्म ढाए थे. अक्सर वे भुक्ताभोगियों या चस्मादीद गवाहों के बयानों को सरासर झूठ करार देने से भी नहीं चूकते.
हाला कि इस तर्क में सचाई भी हो सकती है कि यदि डोइक कैदियों को नहीं मारता तो उसे भी मरना पड़ता. जिस व्यवस्था का वह अंग था उसमे उसके पास कोई विकल्प नहीं था. लेकिन यह तर्क आततायी को निर्दोष करार देने के लिए काफी नहीं.
डोइक का बयान न सिर्फ कम्बोडिया की जनता के लिए वरन पुरी दुनिया के सामने कुछ सवाल खड़े करता है. ख्मेर रुज के चार और बड़े नेता जेल में कैद हैं और कठघरे में खड़े होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह हैं: पोल पोट सरकार में विदेश मंत्री इएंग सारी (Ienge Sary), नुएँ चेया (नुओं चेया), जिसे ब्रदर नंबर दो कहते थे (स्वयं पोल पोट ब्रदर नंबर एक था.), राष्ट्र प्रमुख खिऊ सम्फान (Khieu Samphan), और ख्मेर रुज का सामाजिक मामलों का मंत्री इएंग तिरिथ (Ieng Thirith).
अगर इन पांचो को नरसंहार के लिए दोषी ठहरा भी दिया जाए तो क्या फर्क पड़ेगा?
एक अनुमान के अनुसार कम्बोडिया की आबादी का सत्तर प्रतिशत तीस वर्ष से कम आयु की है. इस पीढी को ख्मेर रुज की कहानी भूत प्रेत की कहानी से ज्यादा वास्तविक नहीं प्रतीत होती है. बड़े बूढे जब अपनी आप बीती बच्चों को सुनाने की कोशिश करते हैं तो वे उन्हें सुनने में रूचि नहीं लेते. ख्मेर रुज के अपराधियों पर मुकदमे की सुनवायी टेलिविज़न पर देखने में भी युवा पीढी को विशेष दिलचस्पी नहीं है. यह कैसी विडम्बना है कि खेमर रुज के सबसे बड़े कैदखाने, तोल स्लेंग के परिसर में जहाँ कभी हजारों लोगों की यातना पूर्वक हत्या हुई, आज बच्चे खलते हैं. वे अपने देश के इतिहास के इस घिनोने अध्याय से लगभग अपिरिचित हैं.
एक के बाद एक सामाजिक अशांति से जूझते रहने के कारण कम्बोडिया के लोगों को ख्मेर रुज की यातनाओं को भूला देना ही बेहतर लगा. तभी तो हत्यारा नेतृत्व कभी अपनी करनी का हिसाब देने की जरूरत नहीं समझा. कम्बोडिया की नई पीढी को वास्तविकता से अवगत करने की कोशिश न तो शासकों ने की न ही परंपरा ने. इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में प्राचीन ख्मेर रुज साम्राज्य की कहानी तो विस्तार से कही गयी है लेकिन पोल पोट के आतंक की कहानी को महत्व नहीं दिया गया.
यह सचमुच गर्व की बात है कि हिन्दू संस्कृति की छत्रछाया में ३० मील से भी ज्यादा दूरी में फैले अंगकोर समूह के मंदिर बौध और हिन्दू परंपरा के सजीव उदहारण के रूप में आज भी पर्वत की तरह खड़े हैं. यकीन नहीं होता कि उस महान ख्मेर के वंसज पोल पोट जैसे आततायी भी हो सकते हैं.
दुर्भाग्य की बात है कि कम्बोडिया के गुनाहगारों को वहां के समाज ने दोषी ठहराने की गंभीर कोशिश नहीं की. वहां शांति स्थापित न हो सकी. यहाँ तक कि १९९७ में फिर सैकडों लोग मारे गए जिनके खुनी कभी पकडे नहीं गए. आज हाल यह है कि देश के कुछ हिस्सों में आम जनता पुलिस की भूमिका खुद निभा लेती है अपराधियो को सजा देने के लिए. वर्षों की हिंसा सहने वाले समाज को यह भरोसा नहीं कि उन्हें सामाजिक न्याय मिल भी सकता हैं.
(यहाँ मैं सोचता हूँ बिहार और झारखण्ड के बारे में जहाँ न्याय की रक्षा करने वाले पुलिस थानों को लूटने और अपराधियों को सरेआम पीट पीट कर मार डालने की खबरें अक्सर सुनाई पड़ती हैं. बिहार और झारखण्ड में सामाजिक न्याय की बिगड़ती हालात को दुरुस्त करने की फिक्र आखिर किसको है?)
लेकिन दुनिया को यह बताना ज़रूरी है कि डोइक ने अपने कैदिओं को किस मानसिकता के तहत प्रताडित करने के बाद उनकी हत्या की. निक डनलप ने अपनी पुस्तक में अनेक ऐसे उदहारण दिए हैं जिनसे यह सबूत मिलता है की हत्यारों ने न केवल अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए कैदिओं की हत्या की वरन उसे इन जघन्य कामों को करते हुए आनंद बोध भी हुआ.
कम्बोडिया और दुनिया को यह समझाना बाकी है कि समाज में वे कौन सी मनःस्थिति बन जाती है कि एक डोइक पैदा होता है. मानवाधिकार मुकदमे की कार्रवाई को अंजाम देना इसलिए ज़रूरी है कि यह मालूम हो सके कि बगुनाह लोगों को मारने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कैसी थी, ताकि लोग अतीत के काले अध्याय से सबक ले सकें. दुनिया और ख़ास कर कम्बोडिया की जनता को यह बताना जरूरी है ताकि फिर डोइक पैदा न हो!
१९९५ में अमेरिका के येल (yale) युनिवर्सिटी ने कम्बोडिया के नरसंहार से सम्बंधित दस्तावेज़ टायर करने का एक कार्यक्रम बनाया जिसके तहत तोल संग कैदिओं के बारे में जानकारी और फोटो एकत्र किया गए. ये दस्तावेज़ मानवता के खिलाफ अपराधिक अदालत में भी पेश किये जायेंगे. कम्बोडिया की जनता को उनके इतिहास के काले अध्याय के बारे में जानकारी देने की दिशा में येल का यह योगदान महत्वपूर्ण है.

Sunday, March 29, 2009

अमेरिका को मंदी से उबार पाएगा ओबामा का समाजवाद!

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अमेरिका को मंदी से उबार पाएगा ओबामा का समाजवाद!
29 Mar 2009, 0000 hrs IST,नवभारत टाइम्स
न्यू जर्सी से अशोक ओझा
वर्ष 2008 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान जब बराक ओबामा ने संपत्ति के बराबर वितरण का नारा दिया था, तो उनके प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन ने ओबामा पर अमेरिका में समाजवाद लाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। मैकेन ने वोटरों को सावधान किया था कि ओबामा उनकी संपत्ति छीनना चाहते हैं। मैकेन को विश्वास था कि अमेरिका में पैसा कमाना ही संस्कृति है और वहां 'समाजवाद' एक अछूत शब्द है, जिसकी काली छाया से लोग दूर भागेंगे और ओबामा को वोट नहीं देंगे।

मैकेन की उम्मीद जल्दी ही टूट गई। बढ़ती बेरोजगारी और आथिर्क मंदी से त्रस्त अमेरिकी जनता को समाजवाद की सचमुच जरूरत थी, लिहाजा उसने मैकेन की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए ओबामा को अमेरिका का प्रेजिडंट चुना। वाइट हाउस में कामकाज संभालते ही ओबामा के सबसे प्रमुख चुनौती थी अमेरिकी इकॉनमी को काबू में लाने की, जिसके लिए उन्होंने सरकार की तरफ से भारी धनराशि खर्च करना जरूरी समझा। जब ओबामा ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सामने 3।6 ट्रिलियन डॉलर का बजट पेश किया तो रिपब्लिकन सदस्यों ने यह कहकर विरोध किया कि 'समाजवादी' ओबामा अमेरिका का राष्ट्रीयकरण करना चाहते हैं।
ओबामा और उनके आथिर्क सलाहकार जानते थे कि देश की आर्थिक मंदी का मुख्य कारण रहा है, हर कीमत पर मुनाफा कमाने की पूंजीवादी मनोवृत्ति और पूंजी निवेश के लिए अतिशय 'रिस्क' लेने की अदूरदर्शिता वाला पुराना बैंकिंग सिद्धांत! इसी कारण लीमन ब्रदर्स जैसी वित्तीय निवेशक संस्थाएं और अमेरिकन इंटरनैशनल ग्रुप जैसी अंतरराष्ट्रीय इंशुअरंस कंपनियां दिवालियापन के कगार पर पहुंच गईं। इन कंपनियों की अरबों की पूंजी गलत निवेश के कारण डूब गई। बुश के शासनकाल में बैंकिंग कंपनियों को डूबने से बचाने के लिए आर्थिक मदद का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह ओबामा के शासनकाल में जारी रहा।
आधुनिक अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ओबामा ने बैंकों और बैंकिंग सेवा में लगी वित्तीय संस्थाओं के लिए 1।8 ट्रिलियन डॉलर की राशि तय की। इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल कारोबार के लिए कर्ज सुलभ कराने के लिए होगा। अनेक समाजवादी अर्थशास्त्रियों ने कहा कि जापान की तरह अमेरिका में भी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए। लेकिन ओबामा समाजवाद की उस सीमा तक नहीं जाना चाहते, जहां कभी भारत जैसे देश जा चुके थे।
आपको याद होगा कि 60 के दशक में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत के सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। उस जमाने में बैंकों द्वारा आम लोगों को कर्ज देने की कोई परंपरा नहीं थी। इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन कर भारतीय नागरिकों के निजी संपत्ति पर हक के मौलिक अधिकार को भी समाप्त कर दिया था। समाजवादी नीतियों के अतिरिक्त इस्तेमाल का यह परिणाम हुआ कि भारत में उपभोक्ता संस्कृति अंकुर पड़ने से पहले ही सूख गई। निजी उद्यमों को सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला, नौकरशाही ने परमिट लाइसंस का साम्राज्य कायम किया, अनुत्पादकता का बोलबाला हो गया और उद्योगों तथा सरकारी नौकरियों में सुरक्षा का माहौल आलस्य और कामचोरी का पर्याय बन गया। भारत तब तक विकास के रास्ते पर नहीं चल पाया, जब तक कि राजीव गांधी और नरसिंह राव की सरकारों ने इकॉनमी को ढीला कर विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत नहीं की और परमिट-लाइसंस का राज खत्म कर उपभोक्ता संस्कृति को पनपने का रास्ता नहीं खोल दिया।
ओबामा के बजट में आर्थिक मंदी दूर करने के लिए बैंकिंग और बीमा कंपनियों को मदद देना उसका एक छोटा-सा हिस्सा था। ओबामा जानते हैं कि उनका समाजवाद तब तक अधूरा रहेगा, जब तक कि लाखों बेरोजगारों को नौकरियां नहीं मिल जातीं और छोटे व्यापारी अपने पैरों पर खड़े होकर काम के इंतजार में बैठे लोगों को नौकरी नहीं दे देते।
सम्पति के समान वितरण का सिद्धांत अमल में लाने के लिए ओबामा ने दो लाख डॉलर सालाना से कम पानेवाले लोगों के लिए टैक्स राहत की घोषणा की, जबकि हर साल ढाई लाख डॉलर से ज्यादा वेतन पानेवालों के लिए इनकम टैक्स की दरें बढ़ा दीं। मुनाफे की संस्कृति से जुड़ी कई मान्यताओं को ओबामा ने ध्वस्त किया। हालांकि वह राष्ट्रीयकरण की सीमा तक जाना नहीं चाहते, लेकिन विकास के हर पहलू को सरकारी मदद से चौड़ा करना चाहते हैं। वैकल्पिक ऊर्जा के लिए संशोधन और उनसे जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन देने की ओबामा की नीति से प्रभावित होकर आज अमेरिका में सोलर और विंड एनर्जी के क्षेत्र में नई तकनीकों के जल्द इस्तेमाल की उम्मीद है। हाइब्रिड कारें तो सड़कों पर चलने ही लगी हैं, हो सकता है कि आनेवाले कुछ बरसों में सड़कों पर गैस स्टेशन (पेट्रोल पंप) की जगह बैट्री चार्ज स्टेशन नजर आएं, जहां इलेक्ट्रिक चालित कारों को चार्ज किया जा सके। जनता की टैक्स राशि पर निर्भर स्कूल शिक्षा को नया जीवन देने के लिए ओबामा ने स्कूल इमारतों की मरम्मत और शिक्षकों का वेतन बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद की घोषणा भी की है।
अमेरिका में 45 करोड़ लोगों को हेल्थ बीमा की सुविधा नहीं है। इतनी बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ओबामा सरकार ने 63।4 करोड़ डॉलर राशि तय की है। इससे भी आर्थिक सुधार का एक पहलू माना जा रहा है क्योंकि बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिलने पर हर नागरिक राष्ट्रीय विकास में बेहतर योगदान कर सकता है।
बैंकों को आर्थिक मदद देने के बाद सरकार उनसे जिम्मेदारी की उम्मीद भी करती है। छोटे उद्योगों में लगे लाखों लोगों को आर्थिक कर्ज उपलब्ध कराना बैंकों की जिम्मेदारी होगी। ओबामा ने इन बैंकों को निर्देश दिया है कि वे स्मॉल बिज़नस को कर्ज देने के मामले में अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट सरकार के सामने नियमित रूप से पेश करें। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी से जूझ रहे इस देश में अब यह मुद्दा विवाद का विषय नहीं रहा कि इकॉनमी में सरकारी हस्तक्षेप कितना 'पूंजीवाद विरोधी' है और कितना 'समाजवाद समर्थक'? जिस तरह भारत 'समाजवाद के ढोंग' के कारण दशकों तक आर्थिक प्रगति से दूर रहा, वैसे ही अमेरिकी समाज अनैतिकता की हद तक मुनाफा कमानेवाले अमेरिकी पूंजीपतियों की असलियत जान चुका है। ऐसे में टैक्सदाताओं (पेयर्स) के पैसे से चलने वाले हर बिज़नस या उद्योग को सरकारी कर्ज खर्च करने की जिम्मेदार नीति बनानी ही होगी। इसलिए जब 1।7 खरब डॉलर का सरकारी कर्ज पाने के बाद अमेरिकन इंटरनैशनल ग्रुप (एआईजी) ने 16.5 करोड़ डॉलर की राशि बोनस के रूप में अपने अफसरों को बांट दी थी तो देश में कोहराम मच गया। यहां तक कि ओबामा भी अमेरिकी पूंजीवाद की कस्टेडियन 'वॉल स्ट्रीट' के खिलाफ क्रोधपूर्ण बयान देने से पीछे नहीं रहे। एआईजी की तिजोरी में 80 फीसदी निवेश आम जनता का है। ऐसी हालत में कंपनी के बड़े अफसरों को बोनस देने का घोर विरोध हो रहा है। मजे की बात यह है कि एआईजी ने अपने 73 अफसरों को एक-एक मिलियन डॉलर का बोनस बांटा। 33.6 मिलियन डॉलर का बोनस जिन 52 अफसरों को बांटा गया था, वे कंपनी छोड़ कर चले भी गए। अमेरिका में बोनस विरोध इतना तेज हो गया कि एआईजी के प्रमुख एडवर्ड लिड्डी को अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति के सामने वादा करना पड़ा कि वे बोनस पाने वाले अधिकारियों से पैसा वापस मांगेंगे। आखिरकार एआईजी के टॉप एग्जेक्यटिव्स को बोनस लौटाने का फैसला करना पड़ा।
अपने विचारों में आस्था रखने वाले बराक ओबामा के लिए मंदी से उबारना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि उनकी नीतियां जनता के हित में हैं और अमेरिकी जनता ने उन्हें अपना पूरा विश्वास दिया हुआ है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनेताओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। भारतीय नेताओं का स्वार्थ और भ्रष्टाचार जगजाहिर है। आर्थिक बदहाली की परवाह किए बिना भारत के 'समाजवादी' नेताओं और स्वार्थी पूंजीपतियों ने अपने काली कमाई स्विस बैंकों में बंद कर दी है, जिसे निकालना आसान नहीं होगा। अमेरिका की ताकतवर राजस्व नीतियों के कारण स्विस बैंक यहां की काली कमाई छुपाने की हिम्मत नहीं कर सकते लेकिन गरीब देशों के तानाशाहों का काला धन पचाने की उनकी परंपरा पुरानी है। अनेक अफ्रीकी तानाशाह मरने सेपहले अपने स्विस बैंक अकाउंट के वारिस घोषित करना भूल गए। इस कारण स्विस बैंक उनकी जमा राशि पचा गए। अफ्रीकी देशों के राजनेताओं और तानाशाहों की कमाई हजम करने के स्विस बैंकों के ट्रैक रेकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में सत्ता से जुड़े राजनेताओं और पूंजीपतियों की काली कमाई स्विस बैंकों से निकालने के लिए भारत की आम जनता को लंबी लड़ाई लड़नी होगी।

Thursday, March 19, 2009

भावुकता और क्रूरता से भरा अमेरिका का पशु प्रेम

इस लेख को मैंने प्रभात ख़बर के लिए लिखा था, लेकिन प्रकाशन तिथि की जानकारी नही मिली.
भावुकता और क्रूरता से भरा अमेरिका का पशु प्रेम
अशोक ओझा
न्यू यार्क की सडकों और पार्कों में अपने मालिकों के साथ घुमने वाले कुत्तों को देखकर लगता है यहाँ के निवासी सचमुच जानवरों से बहुत प्यार करते हैं। कुत्तों के लिए ठण्ड से बचने के लिए स्वेटर और उनके पैरों में पहने के लिए मोजे से लेकर उनके नाखून काटने के लिए सैलून, और शैंपू के लिए मंहगे स्पा तक बने हुए हैं. शौपिंग माल में कुत्ते और बिल्लिओं के लिए खाद्य पदार्थों से भरी अल्मारिओं की लम्बी कतारें अमेरिका की अरबो डॉलर के डॉग फ़ूड उद्योग का जीवंत प्रमाण हैं.

सचमुच अमेरिका नें जानवरों की प्रतिभा का लाभ उठाने के लिए अनेक तरकीबें खोज निकाली हैं। कुत्तों की मदद से नशीले पदार्थों की खोज में भारी मदद मिलती है, सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा के लिए कुत्तों की सूँघने की अद्भुत क्षमता का लाभ भी उठाया जाता है. लेकिन दूसरी तरफ हजारों कुत्ते और बिल्लियों को अपनाने वाले नहीं मिलते. शौपिंग माल के पालतू जानवरों की दूकानों में उन्हें अमानवीय ढंग से पिंजरे में बंद रखा जाता है. चूंकि इन घरेलू जानवरों को सडकों पर बेसहारा नहीं छोडा जा सकता, लगभग सत्तर प्रतिशत कुत्ते और बिल्ली , जिन्हें अपनाने वाला कोई नहीं मिलता, मार दिए जाते हैं.

अमेरिकी लोगों का पशु प्रेम कुत्ते और बिल्लिओं से ही पूरा नहीं होता। वे जंगली तोते, गिलहरी, सफ़ेद चूहे और अजगर आदि भी बड़े शौक से पालते हैं. न्यू यार्क की एक बहुमंजिली इमारत में उस दिन हलचल मच गयी जब यह पता चला कि इमारत की एक मंजिल पर आई टी कंपनी के कर्मचारी का पालतू अजगर छुट्टा घूम रहा है. उस कर्मचारी ने अपने मनोरंजन के लिए डेस्क के नीचे एक ग्लास जार में अजगर पाल रखा था जो उस दिन बहार निकल कर कहीं छुप गया. बड़ी मुश्किल से उसे खोज निकाला गया.

नेत्रहीनों को गाइड करने के लिए अब तक कुत्ते ही सर्वश्रेष्ट माने जाते थे। लेकिन कुछ लोग अब बौने खच्चर भी इस काम के लिए पालने लगे हैं. यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन जब यह पशु प्रेम बन्दर, लंगूर, और चिम्पंजी को भी अपने आगोश में कसने लगा तो परेशानी बढ़ गयी. कनेटिकट प्रदेश में जब एक पालतू चिम्पंजी नें अपने मालिक से मिलने आये मेहमान पर आक्रमण कर दिया तो अमेरिकी कांग्रेस हरकत में आ गयी.

कैपिटल हिल की जन प्रतिनिधि सभा में कनेटिकट की घटना पर गंभीर रूख अपनाते हुए विधेयक पारित किया गया कि प्राईमेंट कहे जाने वाले चिम्पाजी, लंगूर और बंदरों की दूसरी जातियों को पालतू बना कर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की सीमा में नहीं ले जाया जा सकता। यह विधेयक अब सीनेट में बहस के लिए भेजा गया है.

आखिर क्यों लोग इन जीवों को पालतू बना कर अपने घरों में रखना चाहते हैं जिनकी प्रवृति स्वतंत्र घूमने की है? चिम्प, बन्दर, और लंगूर आदि मानव जाति की तरह ही सामाजिक जीव होते हैं। उन्हें अपने बच्चों के प्रति ममता होती है. वे इंसान की तरह ही कभी खुश तो कभी दुखी होते हैं. एक्जोटिक जानवरों के प्रति अमेरिकी लोगों का विशेष लगाव होने के कारण जानवरों के तस्कर उनका व्यापार करते हैं. बन्दर और चिम्प से उनके नवजात बच्चों को छीन लिया जाता है. इन मासूम जीवों को मानव शिशु की तरह ही अपनी माँ से दिन रात चिपके रहने की अदात होती है. यह उनकी प्रकृति है. लेकिन स्मगलरों के पिंजरे में वे अत्यंत दयनीय हो जाते हैं. जब उन्हें कोई पशु प्रेमी खरीदता है तो उनके साथ उनका अटूट लगाव बन जाता है. प्राइंमेट जीवों का यही प्रेम उनके लिए जी का जंजाल हो जाता है. अपने मालिक के प्रति वे इस कदर भावुक होते हैं कि उनमे इर्ष्या जैसी भावनाए जल्दी पैदा हो जाती हैं. वे अपने मालिकों से कभी दूर होना नहीं चाहते. उनसे मिलने वाले पर आक्रमण भी कर देते हैं. चिम्प और बन्दर तो इंसान से कई गुना ताक़तवर होते हैं. इसलिए भावावेश में वे कभी कभी अपने मालिकों पर ही हमला कर देते हैं.

एक पशुप्रेमी एक नवजात बबून को पालतू बना कर घर लाया। मालिक और बन्दर का प्रेम इतना बढ़ गया कि दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर टेलिविज़न देखा करते थे. साथ साथ घूमने जाया करते थे. एक दिन बन्दर ने अकारण ही अपने मालिक पर हमला कर उसे लहूलुहान कर दिया. तब से उसे लिविंग रूम में एक पिंजरे में रखा जाता है जहाँ से वह पूरे दिन टेलिविज़न देखा करता है.

एक और पशुप्रेमी का स्नेह अपने चिम्प के साथ इस हद तक बढ़ गया कि उसने अपने बेटे का कमरा खाली कर उसमे चिम्प को रखा। उस महिला के अपने बच्चे चिम्प प्रेम से इतना तंग आ गए कि आखिरकार उस महला को अपने बच्चों और चिम्प में से किसी एक का चुनाव करना पड़ा. उसने चिम्प को पसंद किया. बच्चे अपने राह कहीं और चले गए.

चालीस से पचास साल तक जीने वाले प्रांईँमेट (चिम्प, बन्दर आदि) का प्रेम अपने मालिकों से कभी कम नहीं होता लेकिन एक समय आता है जब उनके मालिक जानवरों से पिंड छुडाना चाहते हैं। लेकिन तब तक जानवरों के लिए बहुत देर हो चुकी होती है. इंसान के बीच रहने के कारण वे न तो जंगल में रहने लायक होते हैं न ही किसी चिडियाघर में दूसरे जानवरों के साथ. उन्होंने तो जीवन भर आदमी के साथ रहना सीखा है. अपने मालिक से बिछड कर यह जानवर निराशा और उदासी भरा जीवन जीते हैं. अक्सर उनकी तकलीफ दूर करने के लिए उन्हें मौत के घाट सुला दिया जाता है.

जानवरों को मौत के घात सुलाने में अमेरिकी लोग जादा संकोच नहीं करते। कनाडा की ठण्ड से बचने के लिए हजारों जल पक्षी अप्रैल और मई महीने की सुहानी हवा का आनंद लेने हजारों जल पक्षी न्यू जर्सी के रूज़वेल्ट पार्क में हर साल आया करते थे. पार्क के तालाब में तैरते और हरी हरी घास पर विचरण करते साथ में पार्क को गन्दा भी करते थे. यह बात स्थानीय प्रशासन को अच्छी नहीं लगी. निर्णय किया गया की इन् पक्षिओं की संख्या कम की जाए ताकि लोगों को घूमने फिरने के समय पैर मैं पक्षिओं के गूह न लगे. नतीजा यह हुआ कि हजारों पक्षी ज़हर दे कर मार डाले गए. अब पार्क में इतने पक्षी नहीं आते कि वहां गन्दगी हो सके.

जानवरों के साथ, चाहे वे जंगली हों या घरेलू, अमेरिकी लोंगों का सम्बन्ध विरोधाभास से भरा है। कभी पश्चिम की वादिओं में जंगली भैंस, जिन्हें बाईसन कहा जाता था, लाखों की संख्या में घुमा करते थे. उन्हें सिलसिलेवार ढंग से मार दिया गया. यही हाल जंगली घोडों का है, जिन्हें यहाँ के मूल निवासी, इंडियन लोग सदिओं से पालते रहे हैं. न्यू जर्सी के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ घने जंगल हैं, भालू काफी संख्या में रहते हैं लेकिन उनकी आबादी नियंत्रित करने के लिए प्रशासन स्थानीय लोगों को शिकार का लाइसेंस दिया करता है. पशु अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली संस्थाओं नें भालू का शिकार करने पर रोक लगाने के मांग भी कि लेकिन प्रशासनिक शोच पर विशेष असर नहीं पड़ा.

मांसाहार की खातिर जिस देश में लाखों पशुओं की बलि दे दी जाती है, उस देश के लोगों का पशु प्रेम भावुकता और क्रूरता का अजीबोगरीब दृश्य पैदा करता है।

Sunday, March 8, 2009

क्यों होता है बीमार यह दिल बार बार?

हाल ही में दिल की बिमारी के इलाज़ के लिए न्यू ब्रुन्स्विक्क अस्पताल जाना पड़ा। अन्जिओप्लास्ती के दौरान जो भावनाएं मेरे दिमाग में चल रही थी उनका यह वर्णन है जो श्री हरिवंश के संपादन में छपने वाले हिन्दी समाचारपत्र 'प्रभात ख़बर' (रांची, पटना, के साथ कई और स्थानों से प्रकाशित) में गत सप्ताह प्रकाशित हुआ। संपूर्ण लेख इस प्रकार है:

क्यों होता है बीमार यह दिल बार बार?
नई जर्सी से अशोक ओझा
सन १९९८ में जब न्यू यार्क विश्वविद्यालय के अमेरिकी डॉक्टर को मैंने बताया कि मुझे सड़क पर चलते हुए सीने में तकलीफ होती है तो उसने छूटते ही कहा था: साउथ एशियन लोगों को यह बिमारी जादा होती है दिल की बिमारी.

भारतीय मूल के लोगों का दिल दुनिया के और लोगों से अधिक कमजोर है, इस निष्कर्ष को स्वीकार करने का मन नहीं हुआ. मैंने डॉक्टर की बातों पर ध्यान न देते हुए उनसे पूछा कि मेरी बिमारी का इलाज़ क्या है, तो उन्होंने अपने सेक्रेटरी से हॉस्पिटल में तारीख तय करने के लिए कहा जहाँ कि मेरा इलाज़ अनजिओग्राफी के जरिये किया जा सके. तब मुझे सिर्फ दो दिन अस्पताल में रहना पड़ा था जिसके दौरान दिल की दो बंद धमनियों को अन्जिओप्लास्ती की विधि से खोल दिया गया ताकि रक्त प्रवाह सामान्य हो सके. कुछ ही दिनों में मैं सामान्य जीवन जीने लगा.

वर्षों तक स्वस्थ रहने के बाद एक दिन न्यू यार्क की सडकों पर टहलते हुए जब मैंने सीने में जकडन महसूस की तो मन ही मन कहा: "नहीं, इस दर्द का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि दिल कि धमनियां फिर से बंद होने लगी हैं.”

थोडी देर रूकने के बाद सीने का दर्द तो ख़तम हो गया लेकिन मेरी चिंता बनी रही. आखिर इस दर्द से बचने के लिए मैं रोजाना लंच के बाद सड़क पर टहलने जाता था लेकिन दिल फिर से बीमार पड़ ही गया! इस बार मैंने अपने कार्दिओलोजिस्त से, जो कि भारतीय-अमेरिकी हैं, पूछा कि आखिर क्यों होता है बीमार यह दिल बार बार? उन्होंने कहा कि यह तुम्हारे genes में है. नियमित अभ्यास और नियंत्रित खान पान के बावजूद अगर पीढियो से यह समस्या चली आ रही हो तो उससे छुटकारा मिलना आसान नहीं. उन्होंने चेताया कि अगर टहलते हुए बार बार सीने में दर्द या जकडन महसूस हो तो समझो अस्पताल जाना ही पड़ेगा. मैंने अपने आप से कहा कि चलना बंद नहीं करेंगे जब तक कि दर्द पुनः महसूस न हो.

लेकिन मेरे दिल ने मेरी बात कब मानी है! आखिर डॉक्टर के निर्देश पर अस्पताल का रास्ता पकड़ना ही पड़ा जहाँ फिर से वही प्रक्रिया-अनजिओग्राफी और अन्जिओप्लास्ती- की दुहराई जाने वाली थी.
निर्धारित दिन को अस्पताल के गलियारे में मुझे पहिये वाले बिस्तर पर उस कमरे में ले जाया जा रहा था जहाँ डॉक्टर और नर्सें मेरा इंतज़ार कर रही थीं। आपरेशन थिएटर में प्रवेश करने के पूर्व पत्नी और पुत्री ने गुड बाय किस किया. मैं उनकी तरफ देख रहा था. उनके चेहरे पर जैसे यह भाव था: "अकेले ही जाना पड़ेगा ऑपरेशन रूम में, लेकिन वापस आना ठीक होकर.”

पता नहीं अन्दर क्या होगा- मैंने मन ही मन कहा।कुछ ही समय पहले मैं एक आज़ाद व्यक्ति था लेकिन अब अस्पताल के कर्मचारिओं का कैदी, जहाँ से दिल का इलाज़ होने के बाद ही लौट सकता हूँ।

catheterization- यानि शरीर की रक्त वाहिनी के रास्ते से एक पतली प्लास्टिक ट्यूब दिल की धमनियो तक ले जाने की प्रक्रिया- से डॉक्टर दिल के उस हिस्से को देख सकता है जिसमे संकीर्णता आ जाने के कारण रक्त प्रवाह कम हो चुका है और नतीजे के तौर पर चलते समय छाती में दर्द सा महसूस होता है। प्लास्टिक ट्यूब के साथ बैलून तकनीक के सहारे प्रभावित धमनी के संकीर्ण भाग को खोल दिया जाता है और उस जगह स्टील कि नन्ही जाली, जिसे स्टेंट कहा जाता है, रख दी जाती है जो भविष्य में धमनी को फिर से संकीर्ण होने से रोकती है।

"अन्जिओप्लास्ती आज कल तो सामान्य सी बात है", अस्पताल जाने से पहले एक दोस्त ने कहा था। "तुम्हारे डॉक्टर तो इस विधा के टॉप एक्सपर्ट हैं", नर्स मेरे कान में फुसफुसाई, "उनके बारे में कहा जाता है कि वे आँख मूँद कर भी रोगी के दिल में कैथेटर यानि प्लास्टिक ट्यूब घुसा कर अन्जिओप्लास्ती कर सकते हैं", उसने जैसे मुझे आश्वस्त किया.

लेकिन मेरे अन्दर एक अज्ञात भय घुस गया था. "ठीक है मेडिकल तकनीक बहुत प्रगति कर चुका है. एक प्लास्टिक ट्यूब कंप्यूटर के निर्देश पर दिल के उस कोने में जाता है जहाँ रक्त संचार अवरूद्ध हो चुका है. डॉक्टर ट्यूब में लगे बैलून को फूला कर संकीर्ण भाग को चौडा करता है और धमनी को बंद करने के लिए जिम्मेदार अवांछित तत्वों, जिन्हें plaque कहा जाता है, हटा देता है. फिर उसी स्थान पर स्टेंट जमा देता है. लेकिन यह भी तो हो सकता है कि शरीर की आतंरिक संरचना मेडिकल साइंस की नई खोजों को स्वीकार न करे, धमनी को चौडा करते समय उसमे दरार पड़ जाय! कोई भी सौ प्रतिशत गारंटी नहीं दे सकता कि अन्जिओप्लास्ती की प्रक्रिया सफल हो जायेगी." मैं अपने आप से कह रहा था.
मैंने सोचा मुझे कुछ अध्यात्मिक ताकत की ज़रुरत है. मेरी उम्र पहले से तय है. दिल की बिमारी के बावजूद अगर मेरी आयु लम्बी है तो इस मेडिकल प्रक्रिया को सफल होना ही पड़ेगा. पिछली बार मेरा इलाज़ सफल हुआ था तो इस बार क्यों नहीं होगा? शायद मुझे अपने खान पान के बारे में जादा सजग होने चाहिए था और होटल रेस्तौरांत में खाने से पूरी तरह परहेज़ करना चाहिए था. काश मैं ऐसा कर पाता तो शायद मेरे genes में दिल की बिमारी होने और भारतीय यानि साउथ एशियन होने के बावजूद मेरे हृदय की धमनियों में रक्त सामान्य ढंग से दौड़ रहा होता!

मैंने अपने डॉक्टर की योग्यता और मेडिकल साइंस की उपलब्धिओं में पूर्ण विश्वास करने का निश्चय किया। लेकिन मन था कि नर्वस हो रहा था. एक नकारात्मक विचार मानस में दौड़ गया. "अगर प्लास्टिक ट्यूब अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सका या धमनी फट गयी तो क्या होगा. मेरी उम्र अचानक समाप्त! अपने प्रिय जनों से मिले बगैर ही मैं इस दुनिया से जा चुका होऊंगा. क्या करुँ? नहीं चाहिए यह इलाज़. क्या मैं जोर से चिल्लाऊं कि मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ? अगर ऐसा किया तो मुझे पागल समझा जायेगा. मेरी पत्नी और बेटी भी इस बात से घबरा जायेंगे. कोई यह नहीं चाहता कि मैं बिना इलाज़ वापस जाऊं."

मैंने अपने आप से कहा कि चुपचाप लेटे रहना ही ठीक है. जो होगा देखा जायेगा. मैंने नर्स से कहा: "कुछ कहो ताकि मेरी घबराहट दूर हो जाये। "

"मैं आराम करने की दवा देती हूँ।” मैंने देखा उसने एक द्रव्य मेरे हाथ की नशों में प्रवाहित किया. मुझे मालूम था वह दवा नींद लाने की है ताकि मैं जादा सोच न सकूं. अमेरिका में रोगी को दिलासा देने के लिए चिकनी चुपडी बाते सुनाने का रिवाज़ नहीं है. यहाँ हर समस्या के लिए कोई न कोई दवा जरूर है.

"यह मेरे पारिवारिक मित्र हैं।" मुझे डॉक्टर की आवाज़ सुनायी पड़ी जो नर्सों से बात कर रहे थे। मुझे लगा डॉक्टर एक मरीज़ का नहीं एक मित्र का इलाज़ करेंगे।अगले तीस मिनटों तक मैं डॉक्टर और नर्सों के बीच वार्तालाप सुनता रहा जो कि मुख्यतः प्लास्टिक ट्यूब को हृदय की धमनिओं के संकीर्ण हिस्से की तरफ सफ़र का विवरण था. मेरी बाईं तरफ कंप्यूटर स्क्रीन पर काली रेखाएं नृत्य कर रही थी जो कि असल में दिल की धमनियों की कई शाखाएँ थी.

अचानक सीने में चुभन महसूस हुई. नर्स ने कहा आपके हृदय की धमनी में रूकावट को दूर करने के लिए प्लास्टिक ट्यूब का बैलून फुलाया जा रहा है. मैं दर्द को सहने की कोशिश करने लगा इतने में मुझे बताया गया कि स्टेंट अपनी जगह पर बिठा दिया गया है और प्लास्टिक ट्यूब यानि कैथेटर अपना काम कर के वापस लौट रहा है।

डॉक्टर ने मेरी दाहिने जांघ के उपर एक छेद किया था जिसके अंदर कैथेटर घुसाया गया था. वहां मोटी पट्टी बिठा दी गयी ताकि उस छेद से रक्त का रिसाव न हो. मुझे फिर भी तेज दर्द हो रहा था.
मुझे बाहर ले जाया जा रहा था लेकिन मेरा शरीर कह रहा था: "अब पुनः यहाँ न आना पड़े.”
इस बार मैंने अपने आप से वादा किया की चटक मटक खाने से पुर्णतः परहेज करूंगा. क्यों कि पता नहीं दिल फिर कब बीमार पड़ जाये!

Tuesday, March 3, 2009

भेदभाव भरी अमेरिकी बेरोजगारों की जिंदगी!

Published in 03 Mar-2009 Print Edition of नईदुनिया
अमेरिका का पूंजीवादी समाज इस बात पर गर्व करता रहा है कि यहां समृद्ध होने के लिए सबको "समान अवसर" प्राप्त हैं। ऊंचे और अच्छे वेतन के साथ आकर्षक बोनस पाने वाले सीईओ और उसी कंपनी के एक सामान्य कर्मचारी की आमदनी में आकाश-पाताल का फर्क होने के बावजूद एक आम अमेरिकी भेदभाव के समाजवादी नारे को नजरअंदाज कर संतोष की जिंदगी जीना चाहता है।

आर्थिक संकट के दौर में यह सच्चाई कड़वी लगती है कि डूबते बैंकों के आला अफसरों को लाखों डॉलर बोनस मिले जबकि महीनों से बेरोजगार आम आदमी बची-खुची पूंजी भी खत्म करने के कगार पर पहुंच जाए। अमेरिकी श्रम विभाग चार महीने से ज्यादा समय तक बेरोजगारी भत्ता नहीं देता। बड़े अफसरों को नौकरी छोड़ने के बदले लाखों डॉलर के मुआवजे की जानकारी मिलते ही राष्ट्रपति ओबामा ने घोर आपत्ति जताई। दिवालिया होने की कगार पर खड़े इन बैंकों में ओबामा सरकार से आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी। ओबामा ने करोड़ों डॉलर की आर्थिक सहायता तो मुहैया कराई लेकिन अफसरों को लाखों डॉलर बोनस देने के लिए उन कंपनियों को फटकार भी लगाई।

घाटे का समाना करने वाले न्यूयॉर्क के सैकड़ों वित्तीय संस्थानों और बैंकों ने सिर्फ बोनस के रूप में लगभग २० करोड़ डॉलर अपने बड़े अफसरों को बांटे। यहां कुछ उदाहरण देना उचित होगा। विश्व प्रसिद्ध बैंक "सिटी गु्रप" के चीफ एक्जीक्यूटिव विक्रम पंडित को ३२ लाख डॉलर और चेयर मैन सेनफॉर्ड विल को दस लाख डॉलर सालाना बोनस मिलता था जबकि जनरल मोटर्स के सीईओ को ११७ लाख डॉलर। यह वही सिटी बैंक था जिसने घाटे से निबटने के लिए सिंगापुर के निवेशकों का दरवाजा खटखटाया था।

कहते हैं कि अमेरिकी समृद्धि का रहस्य यहां की सख्त "वर्क कल्चर" में छिपा है। शायद यह कल्चर सिर्फ छोटे तबके के लोगों के लिए ही बना है। यूरोप सहित दुनिया के अधिकांश देशों में पूरे साल में एक महीने की अर्जित छुट्टी मिल सकती है लेकिन अमेरिका के कामगारों को सिर्फ दो हफ्ते की। यदि आप पांच साल से अधिक किसी कंपनी में काम कर रहे हो तो आप को तीन हफ्ते की अर्जित छुट्टी मिल सकती है। और चार हफ्ते की छुट्टी पाने के लिए आप की नौकरी कम से कम १० साल की होनी चाहिए। इसके अलावा आप सिर्फ दो दिन का आकस्मिक अवकाश ले सकते हैं।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उधार की शर्तें तो बड़ी सहज कर दी गईं लेकिन नौकरी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं मिली। एक लाख सालाना से ज्यादा वेतन पाने वाले आईटी विशेषज्ञों ने उधार पर मकान और शान-शौकत भरी जिंदगी जीने के लिए महंगी गाड़ी खरीद ली। उन्हें क्या पता था कि उधार की जिंदगी का जलवा उस दिन अचानक धूमिल हो जाएगा जब उनकी नौकरी चली जाएगी और किस्तें या कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाएगा!