प्रभात ख़बर में प्रकाशित:
तीस वर्ष पहले दक्षिण पूर्व एशिया के देश कम्बोडिया में नरसंहार का नंगा नाच हो रहा था. चीन के सहयोग से सत्ता में आयी ख्मेर रुज शासकों ने साम्यवाद स्थापित करने का आसान तरीका खोज निकला था. पोल पोट के नेतृत्व में न केवल देश की राजधानी नोम पेन्ह खली कराई गयी बल्कि शिक्षक से लेकर डॉक्टर तक देश के पढ़े लिखे लोगों की पूरी आबादी को सिलसिलेवार ढंग से मौत के घाट उतारने का कार्यक्रम १९७५ से ले कर १९७९ तक चलता रहा. इन चार वर्षों में सत्रह लाख लोग या तो मार दिए गए या लेबर कैंप में भूख, बिमारी से उनकी मौत हो गयी.
इतिहास बताता है कि साठ के दशक में वियतनाम में अमेरिका ने साम्यवाद से लड़ने के लिए जो युद्ध छेड़ा था उसका उपसंहार कम्बोडिया में हुआ जहाँ साम्यवाद के नाम पर लाखों लोगों की बलि चढाई गयी. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे भयंकर नर संहार था जिसे रोकने की कोशिश युनाइटेड नेशन्स सहित दुनिया के किसी देश ने नहीं किया. नब्बे के दशक में रवांडा और बोस्निया में भी ऐसा ही नर संहार हुआ जिसे होने देने के लिए युनाइटेड नेशन्स के सदस्य देश जिम्मेदार हैं. बहरहाल, यहाँ चर्चा सिर्फ कम्बोडिया की:
नब्बे के दशक में ही युनाइटेड नेशन्स की पहल पर कम्बोडिया में साझे की सरकार बनी जिसमे ख्मेर रुज से अलग होकर कई नेता सत्ता में आ गए. खेमर रुज के कातिल नेता वर्षो तक जँगलों में छिपे रहे. लम्बे समय तक आना कानी के बाद कम्बोडिया के नेता कातिलों पर मुक़दमा चलने के लिए सहमत हुए. खेमर रुज के चार बड़े नेता जेल में डाले गए जिनपर अब जाकर मुक़दमा शुरू हुआ है.
गत ३० मार्च को जिस खेमर रुज नेता पर मुक़दमा शुरू हुआ उसका नाम है kaing Guek Eav जिसे डोइक (Duch) के नाम से जाना जाता है. ६६ वर्षीय डोइक पर १४ हज़ार लोगों को क्रूरता पूर्वक मौत के घाट उतारने का आरोप है जिसके लिए उसपर मानवता के खिलाफ अपराध करने का मामला चलाया जा रहा है. १९७९ में वियतनाम ने कम्बोडिया पर आक्रमण किया तब डोइक जँगलों में भाग गया और १९९७ तक क्रिस्चियन मिसनरी में नाम बदल कर शिक्षक बन कर काम करता रहा. ब्रिटिश लेखक निक डनलप ने डोइक का पता लगाया और उससे मुलाकात का ब्यौरा अपनी पुस्तक, 'द लोस्ट एक्सेकुशनेर' (The lost executioner) में प्रकाशित किया. उस मुलाकात में डोइक नें अपना अपराध कबूल किया था और कम्बोडिया की जनता से माफ़ी मांगी थी.
एक बार फिर डोइक नें अमानवीय अपराधिक अदालत में कबूल किया है कि उसने अपने बड़े अधिकारियों के आदेश पर काम किया. "अगर में कैदियों को मारता नहीं तो मुझे ही मार डाला जाता", उसका बयान है.
सामूहिक नरसंहार करने वाले हत्यारे या यातना देने वालों को जब कठघरे में खडा होने का समय आता है तो वे अपने को निर्दोष साबित करने के लिए एक ही तर्क देते हैं: मैं तो सिर्फ आदेश का पालन कर रहा था.
जर्मनी के नाजी हों या बोस्निया और रवांडा के सैनिक, सभी अपने को भुक्तभोगी साबित करने के लिए कोई कसार नहीं छोड़ते. वे अपने आपको उनकी श्रेणी में रखने की कोशिश करते हैं जिन पर उन्होंने जुल्म ढाए थे. अक्सर वे भुक्ताभोगियों या चस्मादीद गवाहों के बयानों को सरासर झूठ करार देने से भी नहीं चूकते.
हाला कि इस तर्क में सचाई भी हो सकती है कि यदि डोइक कैदियों को नहीं मारता तो उसे भी मरना पड़ता. जिस व्यवस्था का वह अंग था उसमे उसके पास कोई विकल्प नहीं था. लेकिन यह तर्क आततायी को निर्दोष करार देने के लिए काफी नहीं.
डोइक का बयान न सिर्फ कम्बोडिया की जनता के लिए वरन पुरी दुनिया के सामने कुछ सवाल खड़े करता है. ख्मेर रुज के चार और बड़े नेता जेल में कैद हैं और कठघरे में खड़े होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह हैं: पोल पोट सरकार में विदेश मंत्री इएंग सारी (Ienge Sary), नुएँ चेया (नुओं चेया), जिसे ब्रदर नंबर दो कहते थे (स्वयं पोल पोट ब्रदर नंबर एक था.), राष्ट्र प्रमुख खिऊ सम्फान (Khieu Samphan), और ख्मेर रुज का सामाजिक मामलों का मंत्री इएंग तिरिथ (Ieng Thirith).
अगर इन पांचो को नरसंहार के लिए दोषी ठहरा भी दिया जाए तो क्या फर्क पड़ेगा?
एक अनुमान के अनुसार कम्बोडिया की आबादी का सत्तर प्रतिशत तीस वर्ष से कम आयु की है. इस पीढी को ख्मेर रुज की कहानी भूत प्रेत की कहानी से ज्यादा वास्तविक नहीं प्रतीत होती है. बड़े बूढे जब अपनी आप बीती बच्चों को सुनाने की कोशिश करते हैं तो वे उन्हें सुनने में रूचि नहीं लेते. ख्मेर रुज के अपराधियों पर मुकदमे की सुनवायी टेलिविज़न पर देखने में भी युवा पीढी को विशेष दिलचस्पी नहीं है. यह कैसी विडम्बना है कि खेमर रुज के सबसे बड़े कैदखाने, तोल स्लेंग के परिसर में जहाँ कभी हजारों लोगों की यातना पूर्वक हत्या हुई, आज बच्चे खलते हैं. वे अपने देश के इतिहास के इस घिनोने अध्याय से लगभग अपिरिचित हैं.
एक के बाद एक सामाजिक अशांति से जूझते रहने के कारण कम्बोडिया के लोगों को ख्मेर रुज की यातनाओं को भूला देना ही बेहतर लगा. तभी तो हत्यारा नेतृत्व कभी अपनी करनी का हिसाब देने की जरूरत नहीं समझा. कम्बोडिया की नई पीढी को वास्तविकता से अवगत करने की कोशिश न तो शासकों ने की न ही परंपरा ने. इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में प्राचीन ख्मेर रुज साम्राज्य की कहानी तो विस्तार से कही गयी है लेकिन पोल पोट के आतंक की कहानी को महत्व नहीं दिया गया.
यह सचमुच गर्व की बात है कि हिन्दू संस्कृति की छत्रछाया में ३० मील से भी ज्यादा दूरी में फैले अंगकोर समूह के मंदिर बौध और हिन्दू परंपरा के सजीव उदहारण के रूप में आज भी पर्वत की तरह खड़े हैं. यकीन नहीं होता कि उस महान ख्मेर के वंसज पोल पोट जैसे आततायी भी हो सकते हैं.
दुर्भाग्य की बात है कि कम्बोडिया के गुनाहगारों को वहां के समाज ने दोषी ठहराने की गंभीर कोशिश नहीं की. वहां शांति स्थापित न हो सकी. यहाँ तक कि १९९७ में फिर सैकडों लोग मारे गए जिनके खुनी कभी पकडे नहीं गए. आज हाल यह है कि देश के कुछ हिस्सों में आम जनता पुलिस की भूमिका खुद निभा लेती है अपराधियो को सजा देने के लिए. वर्षों की हिंसा सहने वाले समाज को यह भरोसा नहीं कि उन्हें सामाजिक न्याय मिल भी सकता हैं.
(यहाँ मैं सोचता हूँ बिहार और झारखण्ड के बारे में जहाँ न्याय की रक्षा करने वाले पुलिस थानों को लूटने और अपराधियों को सरेआम पीट पीट कर मार डालने की खबरें अक्सर सुनाई पड़ती हैं. बिहार और झारखण्ड में सामाजिक न्याय की बिगड़ती हालात को दुरुस्त करने की फिक्र आखिर किसको है?)
लेकिन दुनिया को यह बताना ज़रूरी है कि डोइक ने अपने कैदिओं को किस मानसिकता के तहत प्रताडित करने के बाद उनकी हत्या की. निक डनलप ने अपनी पुस्तक में अनेक ऐसे उदहारण दिए हैं जिनसे यह सबूत मिलता है की हत्यारों ने न केवल अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए कैदिओं की हत्या की वरन उसे इन जघन्य कामों को करते हुए आनंद बोध भी हुआ.
कम्बोडिया और दुनिया को यह समझाना बाकी है कि समाज में वे कौन सी मनःस्थिति बन जाती है कि एक डोइक पैदा होता है. मानवाधिकार मुकदमे की कार्रवाई को अंजाम देना इसलिए ज़रूरी है कि यह मालूम हो सके कि बगुनाह लोगों को मारने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कैसी थी, ताकि लोग अतीत के काले अध्याय से सबक ले सकें. दुनिया और ख़ास कर कम्बोडिया की जनता को यह बताना जरूरी है ताकि फिर डोइक पैदा न हो!
१९९५ में अमेरिका के येल (yale) युनिवर्सिटी ने कम्बोडिया के नरसंहार से सम्बंधित दस्तावेज़ टायर करने का एक कार्यक्रम बनाया जिसके तहत तोल संग कैदिओं के बारे में जानकारी और फोटो एकत्र किया गए. ये दस्तावेज़ मानवता के खिलाफ अपराधिक अदालत में भी पेश किये जायेंगे. कम्बोडिया की जनता को उनके इतिहास के काले अध्याय के बारे में जानकारी देने की दिशा में येल का यह योगदान महत्वपूर्ण है.
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