नवभारत टाईम्स, २ मई:
अमेरिका के दक्षिणी प्रदेश फ्लोरिडा के कीवेस्ट द्वीप से लगभग एक सौ मील दूर बसा क्यूबा
पिछली आधी शताब्दी से अमेरिकी विदेश नीति की वर्ण व्यवस्था में अछूत की तरह खड़ा है। दोनों देशों के बीच 1961 से ही कोई कूटनीतिक संपर्क नहीं है। फिदेल कास्त्रो की साम्यवादी तानाशाही के कारण क्यूबा से विस्थापित होकर अमेरिका और खासकर मियामी शहर में बसे लाखों आप्रवासी अपनी मातृभूमि जाने से वंचित थे। उन्हें यह भी छूट हासिल नहीं थी कि वे अपने परिवार वालों को पैसे भेज सकें, जैसा कि अमेरिका के ज्यादातर आप्रवासी करते हैं। अमेरिका ने क्यूबा पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे थे। पर 13 अप्रैल से इस स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आ गया है। असल में बराक ओबामा ने घोषणा की है कि अब से क्यूबा मूल के आप्रवासी न सिर्फ अपनी मातृभूमि की यात्रा कर सकते हैं, बल्कि अपने परिवार को पैसे भी भेज सकते हैं। इससे क्यूबा मूल के वे आप्रवासी बेहद प्रसन्न हैं, जिनके परिवार के सदस्य क्यूबा में हैं।
क्यूबा के अप्रवासियों के लिए अपने देश में पैसा भेजने की छूट एक बड़ी सुविधा है। अमेरिका में रहने वाले फिदेल कास्त्रो के घोर विरोधी क्यूबावासी कास्त्रो को दंडित करने की मांग वर्षों से करते आ रहे थे, लेकिन अब वे ओबामा की नई नीति का खुल कर स्वागत कर रहे हैं।
ओबामा के इस फैसले से 2004 में भूतपूर्व राष्ट्रपति बुश द्वारा लगाई गई आर्थिक नाकाबंदी ढीली पड़ गई है। इससे दोनों देशों के बीच नया दौर तो शुरू हुआ ही है, अमेरिका और दक्षिण के गरीब देशों को यह संदेश भी मिला है कि वॉशिंगटन दक्षिण के गैर पूंजीवादी देशों के साथ तनाव कम करना चाहता है और उनके साथ अच्छे पड़ोसी का व्यवहार करना चाहता है। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का रवैया मोहल्ले के उस दादा की तरह था, जो अपने पड़ोसियों को धमकाता रहता है। ग्रेनाडा में अमेरिकी सैनिकों को भेजने की रोनाल्ड रेगन की नीति और पनामा के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर मियामी की जेल में कैद करने का कदम ऐसी ही नीति का अंग था। अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अमेरिकी-महादेश के किसी भी कोने में बेरोकटोक सैनिक कार्रवाई करता रहा है।
बुश के शासनकाल में मेक्सिको सहित तमाम दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ अमेरिका की नीति में बेहद तनाव आ गया था। फिदेल कास्त्रो के सबसे बड़े प्रशंसक बन कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्युगो चावेज अमेरिका को चुनौती दे रहे थे। ब्राजील के लोकप्रिय राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा अमेरिका के बदले भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के ज्यादा नजदीक जा रहे थे। अमेरिका में मेक्सिको से आए अनधिकृत अप्रवासियों के साथ बुरा सलूक किए जाने के कारण मेक्सिको-अमेरिका के बीच भी तनाव काफी बढ़ गया था।
क्यूबा के प्रति अमेरिकी रुख में बदलाव ओबामा की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग है, जिसे वे अपने चुनाव प्रचार के दौरान रेखांकित कर चुके हैं। दुनिया के अमेरिका-विरोधियों से मुंह न मोड़ कर उनके साथ बात करने की नीति को वे कमजोरी नहीं मानते। 9/11 के बाद बुश की नीतियों से दुनिया भर में अमेरिका की छवि धूमिल हुई है, इस छवि को ओबामा सुधारना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि दुनिया अमेरिका को एक सहयोगी राष्ट्र के रूप में देखे, न कि एक ऐसे ताकतवर देश की तरह जो अपनी बात मनवाने के लिए जबरदस्ती करता रहता है।
अमेरिका और क्यूबा के बीच कड़वाहट का इतिहास साठ साल से भी ज्यादा पुराना है। 1959 में फिदेल कास्त्रो ने क्रांतिकारी विद्रोह की ताकत से देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली। लेनिन और मार्क्स की विचारधारा से प्रेरित कास्त्रो ने निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और अमेरिकी आयात पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए। संबंध इतने खराब हो गए कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने क्यूबा पर स्थायी प्रतिबंध (अम्बर्गो) लगाने की घोषणा कर दी।
सन 1962 के उन दिनों में क्यूबा में सोवियत मिसाइल लगाने के सवाल पर सोवियत राष्ट्रपति ख्रुश्चेव और अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनडी के बीच टकराव इस हद तक पहुंच गया था कि उसका अंजाम तीसरे विश्व युद्ध के रूप में हो सकता था। आणविक हथियारों से लैस दुनिया की दो महाशक्तियां एक दूसरे की चाल का जवाब देने के लिए तैयार थीं। अमेरिका की खुफिया एजंसियों ने खबर दी कि सोवियत संघ ने क्यूबा की धरती पर न्यूक्लियर मिसाइल स्थापित कर दी है तो अमेरिकी विदेश विभाग ने क्यूबा पर आक्रमण करने की सलाह राष्ट्रपति कैनडी को दी। लेकिन धैर्य और कूटनीति का सहारा लेते हुए कैनेडी ने क्यूबा की नौसैनिक घेरेबंदी का निर्णय किया, जिसके एक सप्ताह बाद ही ख्रुश्चेव को मिसाइल हटा लेने की घोषणा करनी पड़ी।
तब से फिदेल कास्त्रो और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते ही चले गए। कास्त्रो ने अमेरिका को साम्राज्यवादी देश कहकर सोवियत रूस कैंप में शरण ली, तो सीआईए ने कास्त्रो को मार डालने के लिए क्यूबन आप्रवासियों के गिरोह हवाना भेजने से लेकर कास्त्रो के लिए सिगार में विस्फोटक डालने तक की साजिश रची। लेकिन कास्त्रो अभी तक जिंदा हैं और अब देश का शासन उन्होंने अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप रखा है।
फिलहाल ओबामा के लचीलेपन की नीति का अर्थ सिर्फ इतना है कि वे हवाना को बताना चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर बनाने की अगली पहल क्यूबा को करनी होगी। अमेरिका चाहता है कि क्यूबा लोकतंत्र का रास्ता पकडे़। वहां राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए और मानवाधिकारों का उल्लंघन बंद हो। एक जमाने में क्यूबा अमेरिका की आंख की किरकिरी था। आज हालात बदल चुके हैं। कास्त्रो सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं। सोवियत संघ बिखर चुका है। क्यूबा अपनी गरीबी का बोझ झेलने के काबिल नहीं। वह अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्त होना चाहता है।
अमेरिका के लिए क्यूबा से अधिक महत्वपूर्ण दूसरे मुद्दे हैं। वह चावेज को काबू में करना चाहता है और कोलंबिया से मेक्सिको तक फैले नशीले पदार्थों के विशाल साम्राज्य को समाप्त करना चाहता है। इसके लिए ओबामा इन देशों से टकराव के बदले उनका सहयोग लेना बेहतर समझते हैं।
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