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अमेरिका को मंदी से उबार पाएगा ओबामा का समाजवाद!
29 Mar 2009, 0000 hrs IST,नवभारत टाइम्स
न्यू जर्सी से अशोक ओझा
वर्ष 2008 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान जब बराक ओबामा ने संपत्ति के बराबर वितरण का नारा दिया था, तो उनके प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन ने ओबामा पर अमेरिका में समाजवाद लाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। मैकेन ने वोटरों को सावधान किया था कि ओबामा उनकी संपत्ति छीनना चाहते हैं। मैकेन को विश्वास था कि अमेरिका में पैसा कमाना ही संस्कृति है और वहां 'समाजवाद' एक अछूत शब्द है, जिसकी काली छाया से लोग दूर भागेंगे और ओबामा को वोट नहीं देंगे।
मैकेन की उम्मीद जल्दी ही टूट गई। बढ़ती बेरोजगारी और आथिर्क मंदी से त्रस्त अमेरिकी जनता को समाजवाद की सचमुच जरूरत थी, लिहाजा उसने मैकेन की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए ओबामा को अमेरिका का प्रेजिडंट चुना। वाइट हाउस में कामकाज संभालते ही ओबामा के सबसे प्रमुख चुनौती थी अमेरिकी इकॉनमी को काबू में लाने की, जिसके लिए उन्होंने सरकार की तरफ से भारी धनराशि खर्च करना जरूरी समझा। जब ओबामा ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सामने 3।6 ट्रिलियन डॉलर का बजट पेश किया तो रिपब्लिकन सदस्यों ने यह कहकर विरोध किया कि 'समाजवादी' ओबामा अमेरिका का राष्ट्रीयकरण करना चाहते हैं।
ओबामा और उनके आथिर्क सलाहकार जानते थे कि देश की आर्थिक मंदी का मुख्य कारण रहा है, हर कीमत पर मुनाफा कमाने की पूंजीवादी मनोवृत्ति और पूंजी निवेश के लिए अतिशय 'रिस्क' लेने की अदूरदर्शिता वाला पुराना बैंकिंग सिद्धांत! इसी कारण लीमन ब्रदर्स जैसी वित्तीय निवेशक संस्थाएं और अमेरिकन इंटरनैशनल ग्रुप जैसी अंतरराष्ट्रीय इंशुअरंस कंपनियां दिवालियापन के कगार पर पहुंच गईं। इन कंपनियों की अरबों की पूंजी गलत निवेश के कारण डूब गई। बुश के शासनकाल में बैंकिंग कंपनियों को डूबने से बचाने के लिए आर्थिक मदद का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह ओबामा के शासनकाल में जारी रहा।
आधुनिक अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ओबामा ने बैंकों और बैंकिंग सेवा में लगी वित्तीय संस्थाओं के लिए 1।8 ट्रिलियन डॉलर की राशि तय की। इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल कारोबार के लिए कर्ज सुलभ कराने के लिए होगा। अनेक समाजवादी अर्थशास्त्रियों ने कहा कि जापान की तरह अमेरिका में भी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए। लेकिन ओबामा समाजवाद की उस सीमा तक नहीं जाना चाहते, जहां कभी भारत जैसे देश जा चुके थे।
आपको याद होगा कि 60 के दशक में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत के सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। उस जमाने में बैंकों द्वारा आम लोगों को कर्ज देने की कोई परंपरा नहीं थी। इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन कर भारतीय नागरिकों के निजी संपत्ति पर हक के मौलिक अधिकार को भी समाप्त कर दिया था। समाजवादी नीतियों के अतिरिक्त इस्तेमाल का यह परिणाम हुआ कि भारत में उपभोक्ता संस्कृति अंकुर पड़ने से पहले ही सूख गई। निजी उद्यमों को सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला, नौकरशाही ने परमिट लाइसंस का साम्राज्य कायम किया, अनुत्पादकता का बोलबाला हो गया और उद्योगों तथा सरकारी नौकरियों में सुरक्षा का माहौल आलस्य और कामचोरी का पर्याय बन गया। भारत तब तक विकास के रास्ते पर नहीं चल पाया, जब तक कि राजीव गांधी और नरसिंह राव की सरकारों ने इकॉनमी को ढीला कर विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत नहीं की और परमिट-लाइसंस का राज खत्म कर उपभोक्ता संस्कृति को पनपने का रास्ता नहीं खोल दिया।
ओबामा के बजट में आर्थिक मंदी दूर करने के लिए बैंकिंग और बीमा कंपनियों को मदद देना उसका एक छोटा-सा हिस्सा था। ओबामा जानते हैं कि उनका समाजवाद तब तक अधूरा रहेगा, जब तक कि लाखों बेरोजगारों को नौकरियां नहीं मिल जातीं और छोटे व्यापारी अपने पैरों पर खड़े होकर काम के इंतजार में बैठे लोगों को नौकरी नहीं दे देते।
सम्पति के समान वितरण का सिद्धांत अमल में लाने के लिए ओबामा ने दो लाख डॉलर सालाना से कम पानेवाले लोगों के लिए टैक्स राहत की घोषणा की, जबकि हर साल ढाई लाख डॉलर से ज्यादा वेतन पानेवालों के लिए इनकम टैक्स की दरें बढ़ा दीं। मुनाफे की संस्कृति से जुड़ी कई मान्यताओं को ओबामा ने ध्वस्त किया। हालांकि वह राष्ट्रीयकरण की सीमा तक जाना नहीं चाहते, लेकिन विकास के हर पहलू को सरकारी मदद से चौड़ा करना चाहते हैं। वैकल्पिक ऊर्जा के लिए संशोधन और उनसे जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन देने की ओबामा की नीति से प्रभावित होकर आज अमेरिका में सोलर और विंड एनर्जी के क्षेत्र में नई तकनीकों के जल्द इस्तेमाल की उम्मीद है। हाइब्रिड कारें तो सड़कों पर चलने ही लगी हैं, हो सकता है कि आनेवाले कुछ बरसों में सड़कों पर गैस स्टेशन (पेट्रोल पंप) की जगह बैट्री चार्ज स्टेशन नजर आएं, जहां इलेक्ट्रिक चालित कारों को चार्ज किया जा सके। जनता की टैक्स राशि पर निर्भर स्कूल शिक्षा को नया जीवन देने के लिए ओबामा ने स्कूल इमारतों की मरम्मत और शिक्षकों का वेतन बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद की घोषणा भी की है।
अमेरिका में 45 करोड़ लोगों को हेल्थ बीमा की सुविधा नहीं है। इतनी बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ओबामा सरकार ने 63।4 करोड़ डॉलर राशि तय की है। इससे भी आर्थिक सुधार का एक पहलू माना जा रहा है क्योंकि बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिलने पर हर नागरिक राष्ट्रीय विकास में बेहतर योगदान कर सकता है।
बैंकों को आर्थिक मदद देने के बाद सरकार उनसे जिम्मेदारी की उम्मीद भी करती है। छोटे उद्योगों में लगे लाखों लोगों को आर्थिक कर्ज उपलब्ध कराना बैंकों की जिम्मेदारी होगी। ओबामा ने इन बैंकों को निर्देश दिया है कि वे स्मॉल बिज़नस को कर्ज देने के मामले में अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट सरकार के सामने नियमित रूप से पेश करें। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी से जूझ रहे इस देश में अब यह मुद्दा विवाद का विषय नहीं रहा कि इकॉनमी में सरकारी हस्तक्षेप कितना 'पूंजीवाद विरोधी' है और कितना 'समाजवाद समर्थक'? जिस तरह भारत 'समाजवाद के ढोंग' के कारण दशकों तक आर्थिक प्रगति से दूर रहा, वैसे ही अमेरिकी समाज अनैतिकता की हद तक मुनाफा कमानेवाले अमेरिकी पूंजीपतियों की असलियत जान चुका है। ऐसे में टैक्सदाताओं (पेयर्स) के पैसे से चलने वाले हर बिज़नस या उद्योग को सरकारी कर्ज खर्च करने की जिम्मेदार नीति बनानी ही होगी। इसलिए जब 1।7 खरब डॉलर का सरकारी कर्ज पाने के बाद अमेरिकन इंटरनैशनल ग्रुप (एआईजी) ने 16.5 करोड़ डॉलर की राशि बोनस के रूप में अपने अफसरों को बांट दी थी तो देश में कोहराम मच गया। यहां तक कि ओबामा भी अमेरिकी पूंजीवाद की कस्टेडियन 'वॉल स्ट्रीट' के खिलाफ क्रोधपूर्ण बयान देने से पीछे नहीं रहे। एआईजी की तिजोरी में 80 फीसदी निवेश आम जनता का है। ऐसी हालत में कंपनी के बड़े अफसरों को बोनस देने का घोर विरोध हो रहा है। मजे की बात यह है कि एआईजी ने अपने 73 अफसरों को एक-एक मिलियन डॉलर का बोनस बांटा। 33.6 मिलियन डॉलर का बोनस जिन 52 अफसरों को बांटा गया था, वे कंपनी छोड़ कर चले भी गए। अमेरिका में बोनस विरोध इतना तेज हो गया कि एआईजी के प्रमुख एडवर्ड लिड्डी को अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति के सामने वादा करना पड़ा कि वे बोनस पाने वाले अधिकारियों से पैसा वापस मांगेंगे। आखिरकार एआईजी के टॉप एग्जेक्यटिव्स को बोनस लौटाने का फैसला करना पड़ा।
अपने विचारों में आस्था रखने वाले बराक ओबामा के लिए मंदी से उबारना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि उनकी नीतियां जनता के हित में हैं और अमेरिकी जनता ने उन्हें अपना पूरा विश्वास दिया हुआ है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनेताओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। भारतीय नेताओं का स्वार्थ और भ्रष्टाचार जगजाहिर है। आर्थिक बदहाली की परवाह किए बिना भारत के 'समाजवादी' नेताओं और स्वार्थी पूंजीपतियों ने अपने काली कमाई स्विस बैंकों में बंद कर दी है, जिसे निकालना आसान नहीं होगा। अमेरिका की ताकतवर राजस्व नीतियों के कारण स्विस बैंक यहां की काली कमाई छुपाने की हिम्मत नहीं कर सकते लेकिन गरीब देशों के तानाशाहों का काला धन पचाने की उनकी परंपरा पुरानी है। अनेक अफ्रीकी तानाशाह मरने सेपहले अपने स्विस बैंक अकाउंट के वारिस घोषित करना भूल गए। इस कारण स्विस बैंक उनकी जमा राशि पचा गए। अफ्रीकी देशों के राजनेताओं और तानाशाहों की कमाई हजम करने के स्विस बैंकों के ट्रैक रेकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में सत्ता से जुड़े राजनेताओं और पूंजीपतियों की काली कमाई स्विस बैंकों से निकालने के लिए भारत की आम जनता को लंबी लड़ाई लड़नी होगी।
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