Thursday, March 19, 2009

भावुकता और क्रूरता से भरा अमेरिका का पशु प्रेम

इस लेख को मैंने प्रभात ख़बर के लिए लिखा था, लेकिन प्रकाशन तिथि की जानकारी नही मिली.
भावुकता और क्रूरता से भरा अमेरिका का पशु प्रेम
अशोक ओझा
न्यू यार्क की सडकों और पार्कों में अपने मालिकों के साथ घुमने वाले कुत्तों को देखकर लगता है यहाँ के निवासी सचमुच जानवरों से बहुत प्यार करते हैं। कुत्तों के लिए ठण्ड से बचने के लिए स्वेटर और उनके पैरों में पहने के लिए मोजे से लेकर उनके नाखून काटने के लिए सैलून, और शैंपू के लिए मंहगे स्पा तक बने हुए हैं. शौपिंग माल में कुत्ते और बिल्लिओं के लिए खाद्य पदार्थों से भरी अल्मारिओं की लम्बी कतारें अमेरिका की अरबो डॉलर के डॉग फ़ूड उद्योग का जीवंत प्रमाण हैं.

सचमुच अमेरिका नें जानवरों की प्रतिभा का लाभ उठाने के लिए अनेक तरकीबें खोज निकाली हैं। कुत्तों की मदद से नशीले पदार्थों की खोज में भारी मदद मिलती है, सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा के लिए कुत्तों की सूँघने की अद्भुत क्षमता का लाभ भी उठाया जाता है. लेकिन दूसरी तरफ हजारों कुत्ते और बिल्लियों को अपनाने वाले नहीं मिलते. शौपिंग माल के पालतू जानवरों की दूकानों में उन्हें अमानवीय ढंग से पिंजरे में बंद रखा जाता है. चूंकि इन घरेलू जानवरों को सडकों पर बेसहारा नहीं छोडा जा सकता, लगभग सत्तर प्रतिशत कुत्ते और बिल्ली , जिन्हें अपनाने वाला कोई नहीं मिलता, मार दिए जाते हैं.

अमेरिकी लोगों का पशु प्रेम कुत्ते और बिल्लिओं से ही पूरा नहीं होता। वे जंगली तोते, गिलहरी, सफ़ेद चूहे और अजगर आदि भी बड़े शौक से पालते हैं. न्यू यार्क की एक बहुमंजिली इमारत में उस दिन हलचल मच गयी जब यह पता चला कि इमारत की एक मंजिल पर आई टी कंपनी के कर्मचारी का पालतू अजगर छुट्टा घूम रहा है. उस कर्मचारी ने अपने मनोरंजन के लिए डेस्क के नीचे एक ग्लास जार में अजगर पाल रखा था जो उस दिन बहार निकल कर कहीं छुप गया. बड़ी मुश्किल से उसे खोज निकाला गया.

नेत्रहीनों को गाइड करने के लिए अब तक कुत्ते ही सर्वश्रेष्ट माने जाते थे। लेकिन कुछ लोग अब बौने खच्चर भी इस काम के लिए पालने लगे हैं. यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन जब यह पशु प्रेम बन्दर, लंगूर, और चिम्पंजी को भी अपने आगोश में कसने लगा तो परेशानी बढ़ गयी. कनेटिकट प्रदेश में जब एक पालतू चिम्पंजी नें अपने मालिक से मिलने आये मेहमान पर आक्रमण कर दिया तो अमेरिकी कांग्रेस हरकत में आ गयी.

कैपिटल हिल की जन प्रतिनिधि सभा में कनेटिकट की घटना पर गंभीर रूख अपनाते हुए विधेयक पारित किया गया कि प्राईमेंट कहे जाने वाले चिम्पाजी, लंगूर और बंदरों की दूसरी जातियों को पालतू बना कर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की सीमा में नहीं ले जाया जा सकता। यह विधेयक अब सीनेट में बहस के लिए भेजा गया है.

आखिर क्यों लोग इन जीवों को पालतू बना कर अपने घरों में रखना चाहते हैं जिनकी प्रवृति स्वतंत्र घूमने की है? चिम्प, बन्दर, और लंगूर आदि मानव जाति की तरह ही सामाजिक जीव होते हैं। उन्हें अपने बच्चों के प्रति ममता होती है. वे इंसान की तरह ही कभी खुश तो कभी दुखी होते हैं. एक्जोटिक जानवरों के प्रति अमेरिकी लोगों का विशेष लगाव होने के कारण जानवरों के तस्कर उनका व्यापार करते हैं. बन्दर और चिम्प से उनके नवजात बच्चों को छीन लिया जाता है. इन मासूम जीवों को मानव शिशु की तरह ही अपनी माँ से दिन रात चिपके रहने की अदात होती है. यह उनकी प्रकृति है. लेकिन स्मगलरों के पिंजरे में वे अत्यंत दयनीय हो जाते हैं. जब उन्हें कोई पशु प्रेमी खरीदता है तो उनके साथ उनका अटूट लगाव बन जाता है. प्राइंमेट जीवों का यही प्रेम उनके लिए जी का जंजाल हो जाता है. अपने मालिक के प्रति वे इस कदर भावुक होते हैं कि उनमे इर्ष्या जैसी भावनाए जल्दी पैदा हो जाती हैं. वे अपने मालिकों से कभी दूर होना नहीं चाहते. उनसे मिलने वाले पर आक्रमण भी कर देते हैं. चिम्प और बन्दर तो इंसान से कई गुना ताक़तवर होते हैं. इसलिए भावावेश में वे कभी कभी अपने मालिकों पर ही हमला कर देते हैं.

एक पशुप्रेमी एक नवजात बबून को पालतू बना कर घर लाया। मालिक और बन्दर का प्रेम इतना बढ़ गया कि दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर टेलिविज़न देखा करते थे. साथ साथ घूमने जाया करते थे. एक दिन बन्दर ने अकारण ही अपने मालिक पर हमला कर उसे लहूलुहान कर दिया. तब से उसे लिविंग रूम में एक पिंजरे में रखा जाता है जहाँ से वह पूरे दिन टेलिविज़न देखा करता है.

एक और पशुप्रेमी का स्नेह अपने चिम्प के साथ इस हद तक बढ़ गया कि उसने अपने बेटे का कमरा खाली कर उसमे चिम्प को रखा। उस महिला के अपने बच्चे चिम्प प्रेम से इतना तंग आ गए कि आखिरकार उस महला को अपने बच्चों और चिम्प में से किसी एक का चुनाव करना पड़ा. उसने चिम्प को पसंद किया. बच्चे अपने राह कहीं और चले गए.

चालीस से पचास साल तक जीने वाले प्रांईँमेट (चिम्प, बन्दर आदि) का प्रेम अपने मालिकों से कभी कम नहीं होता लेकिन एक समय आता है जब उनके मालिक जानवरों से पिंड छुडाना चाहते हैं। लेकिन तब तक जानवरों के लिए बहुत देर हो चुकी होती है. इंसान के बीच रहने के कारण वे न तो जंगल में रहने लायक होते हैं न ही किसी चिडियाघर में दूसरे जानवरों के साथ. उन्होंने तो जीवन भर आदमी के साथ रहना सीखा है. अपने मालिक से बिछड कर यह जानवर निराशा और उदासी भरा जीवन जीते हैं. अक्सर उनकी तकलीफ दूर करने के लिए उन्हें मौत के घाट सुला दिया जाता है.

जानवरों को मौत के घात सुलाने में अमेरिकी लोग जादा संकोच नहीं करते। कनाडा की ठण्ड से बचने के लिए हजारों जल पक्षी अप्रैल और मई महीने की सुहानी हवा का आनंद लेने हजारों जल पक्षी न्यू जर्सी के रूज़वेल्ट पार्क में हर साल आया करते थे. पार्क के तालाब में तैरते और हरी हरी घास पर विचरण करते साथ में पार्क को गन्दा भी करते थे. यह बात स्थानीय प्रशासन को अच्छी नहीं लगी. निर्णय किया गया की इन् पक्षिओं की संख्या कम की जाए ताकि लोगों को घूमने फिरने के समय पैर मैं पक्षिओं के गूह न लगे. नतीजा यह हुआ कि हजारों पक्षी ज़हर दे कर मार डाले गए. अब पार्क में इतने पक्षी नहीं आते कि वहां गन्दगी हो सके.

जानवरों के साथ, चाहे वे जंगली हों या घरेलू, अमेरिकी लोंगों का सम्बन्ध विरोधाभास से भरा है। कभी पश्चिम की वादिओं में जंगली भैंस, जिन्हें बाईसन कहा जाता था, लाखों की संख्या में घुमा करते थे. उन्हें सिलसिलेवार ढंग से मार दिया गया. यही हाल जंगली घोडों का है, जिन्हें यहाँ के मूल निवासी, इंडियन लोग सदिओं से पालते रहे हैं. न्यू जर्सी के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ घने जंगल हैं, भालू काफी संख्या में रहते हैं लेकिन उनकी आबादी नियंत्रित करने के लिए प्रशासन स्थानीय लोगों को शिकार का लाइसेंस दिया करता है. पशु अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली संस्थाओं नें भालू का शिकार करने पर रोक लगाने के मांग भी कि लेकिन प्रशासनिक शोच पर विशेष असर नहीं पड़ा.

मांसाहार की खातिर जिस देश में लाखों पशुओं की बलि दे दी जाती है, उस देश के लोगों का पशु प्रेम भावुकता और क्रूरता का अजीबोगरीब दृश्य पैदा करता है।

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