हाल ही में दिल की बिमारी के इलाज़ के लिए न्यू ब्रुन्स्विक्क अस्पताल जाना पड़ा। अन्जिओप्लास्ती के दौरान जो भावनाएं मेरे दिमाग में चल रही थी उनका यह वर्णन है जो श्री हरिवंश के संपादन में छपने वाले हिन्दी समाचारपत्र 'प्रभात ख़बर' (रांची, पटना, के साथ कई और स्थानों से प्रकाशित) में गत सप्ताह प्रकाशित हुआ। संपूर्ण लेख इस प्रकार है:
क्यों होता है बीमार यह दिल बार बार?
नई जर्सी से अशोक ओझा
सन १९९८ में जब न्यू यार्क विश्वविद्यालय के अमेरिकी डॉक्टर को मैंने बताया कि मुझे सड़क पर चलते हुए सीने में तकलीफ होती है तो उसने छूटते ही कहा था: साउथ एशियन लोगों को यह बिमारी जादा होती है दिल की बिमारी.
भारतीय मूल के लोगों का दिल दुनिया के और लोगों से अधिक कमजोर है, इस निष्कर्ष को स्वीकार करने का मन नहीं हुआ. मैंने डॉक्टर की बातों पर ध्यान न देते हुए उनसे पूछा कि मेरी बिमारी का इलाज़ क्या है, तो उन्होंने अपने सेक्रेटरी से हॉस्पिटल में तारीख तय करने के लिए कहा जहाँ कि मेरा इलाज़ अनजिओग्राफी के जरिये किया जा सके. तब मुझे सिर्फ दो दिन अस्पताल में रहना पड़ा था जिसके दौरान दिल की दो बंद धमनियों को अन्जिओप्लास्ती की विधि से खोल दिया गया ताकि रक्त प्रवाह सामान्य हो सके. कुछ ही दिनों में मैं सामान्य जीवन जीने लगा.
वर्षों तक स्वस्थ रहने के बाद एक दिन न्यू यार्क की सडकों पर टहलते हुए जब मैंने सीने में जकडन महसूस की तो मन ही मन कहा: "नहीं, इस दर्द का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि दिल कि धमनियां फिर से बंद होने लगी हैं.”
थोडी देर रूकने के बाद सीने का दर्द तो ख़तम हो गया लेकिन मेरी चिंता बनी रही. आखिर इस दर्द से बचने के लिए मैं रोजाना लंच के बाद सड़क पर टहलने जाता था लेकिन दिल फिर से बीमार पड़ ही गया! इस बार मैंने अपने कार्दिओलोजिस्त से, जो कि भारतीय-अमेरिकी हैं, पूछा कि आखिर क्यों होता है बीमार यह दिल बार बार? उन्होंने कहा कि यह तुम्हारे genes में है. नियमित अभ्यास और नियंत्रित खान पान के बावजूद अगर पीढियो से यह समस्या चली आ रही हो तो उससे छुटकारा मिलना आसान नहीं. उन्होंने चेताया कि अगर टहलते हुए बार बार सीने में दर्द या जकडन महसूस हो तो समझो अस्पताल जाना ही पड़ेगा. मैंने अपने आप से कहा कि चलना बंद नहीं करेंगे जब तक कि दर्द पुनः महसूस न हो.
लेकिन मेरे दिल ने मेरी बात कब मानी है! आखिर डॉक्टर के निर्देश पर अस्पताल का रास्ता पकड़ना ही पड़ा जहाँ फिर से वही प्रक्रिया-अनजिओग्राफी और अन्जिओप्लास्ती- की दुहराई जाने वाली थी.
निर्धारित दिन को अस्पताल के गलियारे में मुझे पहिये वाले बिस्तर पर उस कमरे में ले जाया जा रहा था जहाँ डॉक्टर और नर्सें मेरा इंतज़ार कर रही थीं। आपरेशन थिएटर में प्रवेश करने के पूर्व पत्नी और पुत्री ने गुड बाय किस किया. मैं उनकी तरफ देख रहा था. उनके चेहरे पर जैसे यह भाव था: "अकेले ही जाना पड़ेगा ऑपरेशन रूम में, लेकिन वापस आना ठीक होकर.”
पता नहीं अन्दर क्या होगा- मैंने मन ही मन कहा।कुछ ही समय पहले मैं एक आज़ाद व्यक्ति था लेकिन अब अस्पताल के कर्मचारिओं का कैदी, जहाँ से दिल का इलाज़ होने के बाद ही लौट सकता हूँ।
catheterization- यानि शरीर की रक्त वाहिनी के रास्ते से एक पतली प्लास्टिक ट्यूब दिल की धमनियो तक ले जाने की प्रक्रिया- से डॉक्टर दिल के उस हिस्से को देख सकता है जिसमे संकीर्णता आ जाने के कारण रक्त प्रवाह कम हो चुका है और नतीजे के तौर पर चलते समय छाती में दर्द सा महसूस होता है। प्लास्टिक ट्यूब के साथ बैलून तकनीक के सहारे प्रभावित धमनी के संकीर्ण भाग को खोल दिया जाता है और उस जगह स्टील कि नन्ही जाली, जिसे स्टेंट कहा जाता है, रख दी जाती है जो भविष्य में धमनी को फिर से संकीर्ण होने से रोकती है।
"अन्जिओप्लास्ती आज कल तो सामान्य सी बात है", अस्पताल जाने से पहले एक दोस्त ने कहा था। "तुम्हारे डॉक्टर तो इस विधा के टॉप एक्सपर्ट हैं", नर्स मेरे कान में फुसफुसाई, "उनके बारे में कहा जाता है कि वे आँख मूँद कर भी रोगी के दिल में कैथेटर यानि प्लास्टिक ट्यूब घुसा कर अन्जिओप्लास्ती कर सकते हैं", उसने जैसे मुझे आश्वस्त किया.
लेकिन मेरे अन्दर एक अज्ञात भय घुस गया था. "ठीक है मेडिकल तकनीक बहुत प्रगति कर चुका है. एक प्लास्टिक ट्यूब कंप्यूटर के निर्देश पर दिल के उस कोने में जाता है जहाँ रक्त संचार अवरूद्ध हो चुका है. डॉक्टर ट्यूब में लगे बैलून को फूला कर संकीर्ण भाग को चौडा करता है और धमनी को बंद करने के लिए जिम्मेदार अवांछित तत्वों, जिन्हें plaque कहा जाता है, हटा देता है. फिर उसी स्थान पर स्टेंट जमा देता है. लेकिन यह भी तो हो सकता है कि शरीर की आतंरिक संरचना मेडिकल साइंस की नई खोजों को स्वीकार न करे, धमनी को चौडा करते समय उसमे दरार पड़ जाय! कोई भी सौ प्रतिशत गारंटी नहीं दे सकता कि अन्जिओप्लास्ती की प्रक्रिया सफल हो जायेगी." मैं अपने आप से कह रहा था.
मैंने सोचा मुझे कुछ अध्यात्मिक ताकत की ज़रुरत है. मेरी उम्र पहले से तय है. दिल की बिमारी के बावजूद अगर मेरी आयु लम्बी है तो इस मेडिकल प्रक्रिया को सफल होना ही पड़ेगा. पिछली बार मेरा इलाज़ सफल हुआ था तो इस बार क्यों नहीं होगा? शायद मुझे अपने खान पान के बारे में जादा सजग होने चाहिए था और होटल रेस्तौरांत में खाने से पूरी तरह परहेज़ करना चाहिए था. काश मैं ऐसा कर पाता तो शायद मेरे genes में दिल की बिमारी होने और भारतीय यानि साउथ एशियन होने के बावजूद मेरे हृदय की धमनियों में रक्त सामान्य ढंग से दौड़ रहा होता!
मैंने अपने डॉक्टर की योग्यता और मेडिकल साइंस की उपलब्धिओं में पूर्ण विश्वास करने का निश्चय किया। लेकिन मन था कि नर्वस हो रहा था. एक नकारात्मक विचार मानस में दौड़ गया. "अगर प्लास्टिक ट्यूब अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सका या धमनी फट गयी तो क्या होगा. मेरी उम्र अचानक समाप्त! अपने प्रिय जनों से मिले बगैर ही मैं इस दुनिया से जा चुका होऊंगा. क्या करुँ? नहीं चाहिए यह इलाज़. क्या मैं जोर से चिल्लाऊं कि मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ? अगर ऐसा किया तो मुझे पागल समझा जायेगा. मेरी पत्नी और बेटी भी इस बात से घबरा जायेंगे. कोई यह नहीं चाहता कि मैं बिना इलाज़ वापस जाऊं."
मैंने अपने आप से कहा कि चुपचाप लेटे रहना ही ठीक है. जो होगा देखा जायेगा. मैंने नर्स से कहा: "कुछ कहो ताकि मेरी घबराहट दूर हो जाये। "
"मैं आराम करने की दवा देती हूँ।” मैंने देखा उसने एक द्रव्य मेरे हाथ की नशों में प्रवाहित किया. मुझे मालूम था वह दवा नींद लाने की है ताकि मैं जादा सोच न सकूं. अमेरिका में रोगी को दिलासा देने के लिए चिकनी चुपडी बाते सुनाने का रिवाज़ नहीं है. यहाँ हर समस्या के लिए कोई न कोई दवा जरूर है.
"यह मेरे पारिवारिक मित्र हैं।" मुझे डॉक्टर की आवाज़ सुनायी पड़ी जो नर्सों से बात कर रहे थे। मुझे लगा डॉक्टर एक मरीज़ का नहीं एक मित्र का इलाज़ करेंगे।अगले तीस मिनटों तक मैं डॉक्टर और नर्सों के बीच वार्तालाप सुनता रहा जो कि मुख्यतः प्लास्टिक ट्यूब को हृदय की धमनिओं के संकीर्ण हिस्से की तरफ सफ़र का विवरण था. मेरी बाईं तरफ कंप्यूटर स्क्रीन पर काली रेखाएं नृत्य कर रही थी जो कि असल में दिल की धमनियों की कई शाखाएँ थी.
अचानक सीने में चुभन महसूस हुई. नर्स ने कहा आपके हृदय की धमनी में रूकावट को दूर करने के लिए प्लास्टिक ट्यूब का बैलून फुलाया जा रहा है. मैं दर्द को सहने की कोशिश करने लगा इतने में मुझे बताया गया कि स्टेंट अपनी जगह पर बिठा दिया गया है और प्लास्टिक ट्यूब यानि कैथेटर अपना काम कर के वापस लौट रहा है।
डॉक्टर ने मेरी दाहिने जांघ के उपर एक छेद किया था जिसके अंदर कैथेटर घुसाया गया था. वहां मोटी पट्टी बिठा दी गयी ताकि उस छेद से रक्त का रिसाव न हो. मुझे फिर भी तेज दर्द हो रहा था.
मुझे बाहर ले जाया जा रहा था लेकिन मेरा शरीर कह रहा था: "अब पुनः यहाँ न आना पड़े.”
इस बार मैंने अपने आप से वादा किया की चटक मटक खाने से पुर्णतः परहेज करूंगा. क्यों कि पता नहीं दिल फिर कब बीमार पड़ जाये!
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