Saturday, January 17, 2009
आइए, भारत की गरीबी का जश्न मनाएं!
18 Jan 2009, को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ। आपकी टिपण्णी का स्वागत है।)
अशोक ओझा न्यू जर्सी
पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी मीडिया में (खासकर अमेरिका में) भारत की आर्थिक प्रगति के बारे में इतना कुछ कहा जा चुका है कि यहां के जनमानस में इस मुल्क (भारत) की खास तस्वीर बन गई। जहां कभी शहरों में सड़कों पर गाएं, सपेरे और हाथी घूमा करते थे, ऐसे गरीब देश में हजारों-लाखों आईटी एक्सपर्ट्स का होना किसी चमत्कार से कम नहीं समझा गया।
दो महीने पहले जब मुंबई की शानदार इमारतों पर आतंकी हमले की आंखोंदेखी छवियां अमेरिकी लोगों ने टीवी और इंटरनेट पर देखीं तो उनका दिल भारत के प्रति सहानुभूति से भर आया। यह वही देश था, जिसे थोडे़ दिनों पहले प्रेज़िडंट बुश और अमेरिकी कांग्रेस ने न्यूक्लिअर डील का तोहफा दिया था। मुंबई ने अमेरिकी दिलों में एक महत्वपूर्ण जगह बना ली।
मुंबई हमले के कुछ ही दिनों बाद झोपड़पट्टी की जिंदगी में गरीबी और बदहाली की नई परिभाषाएं दर्शाती हुई चमक-दमक वाली फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर अमेरिका के कई शहरों में रिलीस हुई। जब इस फिल्म को हॉलिवुड में चार-चार गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों से सम्मानित किया गया तो लगा जैसे अमेरिकी दिलों में इंडिया की हर चीज के लिए प्यार उमड़ आया है, उसकी गरीबी और बदहाली के लिए भी।
हॉलिवुड स्थिति अंतरराष्ट्रीय फिल्म पत्रकारों का संगठन चुनी हुई फिल्मों और टीवी सीरियलों को 'गोल्डन ग्लोब' से पुरस्कृत करता है। स्लमडॉग मिलिनेअर को हॉलिवुड में मिली अभूतपूर्व सफलता के बाद इसे ऑस्कर में सम्मानित करने का रास्ता खुल गया है। सचमुच संगीतकार ए। आर. रहमान में कामयाबी के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां कभी पंडित रविशंकर भी नहीं पहुंच सके। इस फिल्म के ब्रिटिश डाइरेक्टर डैनी बॉयल बवर्ले हिल्स और न्यू यॉर्क में अपनी प्रसिद्धि का जश्न मनाने के बाद अब इंडिया में स्लमडॉग... के रिलीस को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं।
आखिर इस फिल्म में ऐसी कौन-सी बात है, जिसने पश्चिमी दर्शकों और समीक्षकों का मन मोह लिया स्लमडॉग... कहानी है गरीबी और अमीरी के भेदभाव की। यह कहानी है गरीबी और आपराधिक दुनिया के बीच संबंधों की। यह कहानी है भाई-भाई के बीच धोखेबाजी की। लेकिन यह कहानी एक अनाथ बच्चे की मेहनत या प्रतिभा की उतनी नहीं है, जितनी कि एक संयोग। जिसके कारण वह कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्रैम के सभी सवालों का उत्तर दे पाता है। यह उस जीवट या आत्मविश्वास की कहानी नहीं है, जैसा अमिताभ बच्चन जंजीर, कुली और दीवार जैसी फिल्मों में भारतीय दर्शकों को दिखाते रहे। जूते पॉलिश करनेवाले एक अनाथ के यह कहने पर कि 'मैं जमीन पर फेंके हुए पैसे नहीं उठाता' सिनेमा हॉल में तालियां गूंज उठती थीं।
स्लमडॉग... एक निष्ठुर फिल्म है, जिसका निर्देशक गरीब के सपनों का मजाक उड़ाते हुए अनाथ बालक को पाखाने से भरे कुंड (वेल) में डुबकी मारते दिखाता है। फिल्म के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन के स्लम कॉलोनी में हेलिकॉप्टर से उतरने की खबर बस्ती में आंधी की तरह फैल जाती है। लोग पागलों की तरह हेलिकॉप्टर की तरफ दौड़ते हैं। उसी वक्त बालक जमाल को उसके दोस्त एक शौचालय में बंद कर देते हैं।
जमाल करे तो क्या करे! वह नीचे पाखाने के गहरे कुंड की तरफ देखता है, नाक दबाकर डुबकी लगा देता है और दूसरी तरफ से बाहर निकलता है, सिर से पांव तक पाखाने (शिट) से लिपटा हुआ। उसी गंदगी में सना वह अमिताभ की तरफ जाता है ऑटोग्राफ मांगने। जरा सोचिए, यह कैसी कल्पना है! बॉलिवुड के पलायनवादी डाइरेक्टर मनमोहन देसाई ने भी ऐसे सीन की कभी कल्पना नहीं की होगी।
अपनी चमक-दमक और तेज रफ्तार के कारण स्लमडॉग... दर्शक को कुछ सोचने का मौका नहीं देती और घटनाओं को संजोग की डोर में जल्दी-जल्दी पिरोते हुए आगे बढ़ जाती है, जैसे कि ट्रेन छूटने के पहले आप फास्ट फूड रेस्तरां में खाना झपट रहे हों।
अपुर संसार में सत्यजित राय ने, मेघे ढाका तारा में ऋत्विक घटक ने और अंकुर में श्याम बेनेगल ने अपनी कलात्मक और तीखी शैली में गरीबी और सामाजिक अन्याय का गहरा रिश्ता दिखाया था, लेकिन सत्यजीत रॉय को उनकी मृत्यु शैया पर पहुंचने के बाद ही हॉलिवुड ने ऑस्कर के योग्य समझा जबकि घटक, विमल रॉय या बेनेगल को पहचानने से भी इनकार किया। ब्रिटिश राज के दौरान सामान्य भारतीयों का स्वाभिमान दिखानेवाली बॉलिवुड फिल्म लगान भी ऑस्कर के शामियाने में न पहुंच सकी।
शीशे की तरह पारदर्शी और हृदयहीन फिल्म स्लमडॉग... हमें यह याद दिलाती है कि भारत में अनाथ बच्चों के लिए एक ही जगह है, जहां से उन्हें अंधा बनाकर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। ताजमहल के गाइड चोर और फरेबी होते हैं। स्लमडॉग... से हमने यह भी जाना कि वहां पले-बढ़े बच्चे के लिए करोड़पति बनना एक संजोग ही हो सकता है। स्लमडॉग... में जमाल सभी सवालों का जवाब इसलिए जानता था कि उन सवालों का उसकी बीती जिंदगी से सीधा नाता था। लेकिन गरीबी में पलकर भी प्रतिभाशाली बनने के अनेक उदाहरण भारत में मिल जाएंगे, जोकि फिल्मों के विषय बन सकते हैं।
भारतीय कलाकार और टेक्नीशियनों को लेकर पश्चिम तर्ज पर मुंबई की स्लम जिंदगी का चित्रण करने वाली फिल्म 'गोल्डन ग्लोब' या 'ऑस्कर' पुरस्कार जीत सकती है और हॉलिवुड भारत की उस पुरानी तस्वीर पर मुहर लगा सकता है कि आर्थिक रूप से प्रगतिशील यह देश असल में हाथी, सपेरे और स्लमडॉग का देश है। आइए, हॉलिवुड के साथ मिलकर हम सभी इस गरीबी के जश्न में शामिल हो जाएं।
संकट से जूझता अमेरिकी समाज
(यह लेख नई दुनिया के लिए मैंने लिखा था।)
अपना मकान, गाड़ी और एक नौकरी- अमेरिका के लोगों के ये तीन सपने आज संकट में हैं। एक जमाना था जब अमेरिका में अमीरों की पहचान इस बात से होती थी कि उनके पास कितनी मोटर गाड़ियां हैं। सन १९७० के दशक में सिर्फ छह प्रतिशत अमेरिकी परिवारों के पास तीन या उससे अधिक कारें थी जबकि सन् २००० तक तीन से अधिक गाड़ियां रखने वाले परिवारों का प्रतिशत १८ तक पहुंच गया। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार अमेरिका में लाइसेंस प्राप्त ड्राइवर की संख्या होगी कुल २०।२० करोड़, जबकि यहां की सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों की संख्या २४।४० करोड़ है।
जैसे-जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आसान किस्तों पर कार खरीदने का चलन बढ़ने लगा, एक औसत मध्यम वर्ग परिवार की कार पर निर्भरता भी बढ़ने लगी। पति-पत्नी की अपनी-अपनी कार होना आम बात हो गई, ऊपर से सामान ढोने के लिए एक पिक-अप ट्रक और अगर परिवार में बच्चे हैं तो एक मिनी वैन से जिंदगी थोड़ी आरामदेह लगने लगी। दशकों तक अमेरिका में एक गैलन पेट्रोल की कीमत कोका कोला की कीमत से अधिक नहीं थी जिससे अमेरिकियों का अधिकांश समय उनकी गाड़ियों में बीतने लगा। गाड़ियों में मनचाही जगहों का सफर जीवन शैली का एक अंग बन गया।
साल २००८ के दौरान अमेरिका में आर्थिक तंगी की आंधी आई, उसने अमेरिकी मध्यम वर्ग की जीवन शैली में उथल-पुथल ला दी । कठोर मेहनत से अपने सपने साकार करने वाला अमेरिकी मध्यम वर्ग अब उससे बचने लगा है। ज्यादा गाड़ी रखना अमीरी की पहचान नहीं, गरीबी को आमंत्रण साबित हो रहा है। नए मॉडल की कार चलाने के शौकीन अमेरिकी अब सस्ती और टिकाऊ कार खरीदकर ज्यादा दिनों तक चलाना चाहते हैं। हर दूसरे-तीसरे साल नए मॉडल बदलने की संस्कृति अब आर्थिक संकट पर कुर्बान हो चुकी है। लाखों की संख्या में बेरोजगार हो रहे लोगों के सामने आमदनी के नए रास्ते ढूंढ़ना गाड़ियां खरीदने से ज्यादा जरूरी हो गया।
अमेरिका की तीन बड़ी कार उत्पादक कंपनियां जीएम, फोर्ड और चर्सलर के मॉडल शो रूम बैठे रहे ग्राहकों के इंतजार में। अमेरिकी रहन-सहन को परिभाषित करने वाली यह तीन कार उत्पादक कंपनियां आर्थिक मंदी की चपेट में ऐसी आई कि बुश सरकार को उनकी राहत के लिए १४ अरब डॉलर का कर्ज मंजूर करना पड़ा। कहा जाने लगा कि यदि फोर्ड, चर्सलर और जीएम को बचाया नहीं गया तो यह कंपनियां दिवालिया हो जाएंगी जिसके कारण कार उद्योग से जुड़े विक्रेता और सर्विस एजेंसियां भी बंद हो जाएंगी। करोड़ों लोगों की बेरोजगारी की भयावह तस्वीर से डर कर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ओबामा ने भी बुश की आर्थिक सहायता योजना का समर्थन किया।
न्यूजर्सी के सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैली "जर्सी गार्डन" नामक शॉपिंग मॉल में गाड़ियों की भीड़ से ट्रेफिक जाम दिखता है। इसका यह अर्थ नहीं की जनता खूब खरीदारी कर रही है। खर्च करने के लिए सैकड़ों डिजाइनर शॉप और डिस्काउंट स्टोर्स के भारी "जर्से गार्डन" में गाड़ियों की भरमार अमेरिकी की अमीरी की नहीं उसकी गरीबी की पहचान बन रही है। जैसे ही हम मॉल में घुसते हैं, लोगों की भीड़ उन दुकानों में दिखती है जहां डिस्काउंट रेट पर कपड़े या जरूरी उपयोग की चीजें बिकती हैं।
सस्ते दाम पर दैनिक उपयोग की चीजें बेचने वाली दुकानों में आधे दाम पर सामान मिलने लगा है। अपनी पुरानी गाड़ी में बैठकर मॉल तक पहुंचे गरीब लोगों की भीड़ इन्हीं दुकानों में ज्यादा दिख रही है। कुछ दुकानों ने सभी नए ग्राहकों को दस डालर के कूपन देना शुरू किया ताकि ग्राहक अपनी मर्जी के सामान सस्ते में खरीद सकें।
दिवालिया होने से बचने के ढेरों किस्म के तरीके दुकानदार अपना रहे हैं। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कुछ दुकानों ने "एक के साथ एक मुफ्त" यानि "एक खरीदो, दूसरा मुफ्त पाओ" का अभियान चला रखा है। इन दुकानों की तरह कैलीफोर्निया के एक कार डीलर ने कार की बिक्री बढ़ाने के लिए, "एक कार खरीदो, दूसरी मुफ्त पाओ" जैसे मार्केटिंग अभियान का सहारा लिया।
पैसा बचाने की कोशिश में लोग महंगे रेस्टोरेंट में जाने से कतराने लगे हैं। सस्ते भोजन की तलाश में एमसी डोनाल्ड जैसे फास्ट फूड रेस्टोरेंट में जाना बेहतर समझते हैं। यह रेस्टोरेंट अमेरिका की उन सौभाग्यशाली कंपनियों में हैं जिनका कारोबार मुनाफे के साथ चल रहा है।
गरीबी बेतहाशा बढ़ रही है। अकेले २००८ साल में ही करीब २५ लाख लोग बेरोजगार हो चुके हैं। नव निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तेजी से बढ़ती बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए जन-प्रतिनिधियों को आगाह किया है कि वे करीब ८०० अरब डॉलर की योजना को जल्दी मंजूरी दें। इस राशि का लगभग आधा हिस्सा नई नौकरियों के लिए खर्च किया जाएगा। ओबामा नई नौकरियां देने वाले बिजनेस और उद्योगों को टैक्स राहत देना चाहते हैं तथा आम नागरिकों को कुछ टैक्स राशि वापस देने की पेशकश कर रहे हैं। स्कूलों की मरम्मत और दूसरे विकास कार्यों के लिए भी भारी धनराशि खर्च करने की योजना है।
फिलहाल अमेरिकी जनता उन दिनों की याद कर रही है जब सन १९२० के बाद भारी मंदी आई थी। न्यूयार्क शहर में लोग ठंड से बचने के लिए अपने जूतों में कागज ठूंस लेते थे। अपने घरों में लकड़ी जलाने को विवश लोग गैस चूल्हे का खर्च सहन करने में असमर्थ थे। डर यह है कि कहीं फिर से वही बुरे दिन लौटकर न आएं। वरना बड़ी मेहनत से बनाए सपने टूट कर बिखरते नजर आएंगे।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और अमेरिका में हैं)
What is fascinating about 'Slumdog Millionaire'?
Mumbai has captured a special place in the hearts and minds of people in the West, especially America. In November 2008, they watched nonstop coverage of some magnificent structures of Mumbai being attacked by terrorists for three nights and three days. For the last several years newspaper readers and television viewers have been bombarded with stories about India's economic growth. More recently Western people were rather taken for a surprise at the lover affair between the outgoing US President George W. Bush and India, an impoverished country turned into an important alliance in the war on terror. Bush rewarded India by pushing a nuclear treaty.
For decades India was better know for its elephants, cows, mystics and snake charmers who roamed the street of its cities. Not long after November 26, when India's most famous city Mumbai was targeted by terrorists, a dazzling movie, 'Slumdog Millionaire' was released in USA. Shot almost entirely on location in stinking slums of Mumbai, the film successfully caught the attention of middle class intellectuals and critics alike who were otherwise busy finding ways to deal with a sinking economy, unemployment and financial scandals. 'Slumdog Millionaire' won four Golden Globe awards for best dramatic film, screenplay, and musical score.
Based on a book by Vikas Swarup the movie traces the life of slum kid who, conquering all odds against him, grows to appear in a popular game show designed after the American TV show 'Who Wants to be a Millionaire?' The protagonist Jamal, though not an example of brilliance in spite of his poverty and misery, answers all questions in the quiz show to become a winner after the whole country throws its moral support behind him.
The movies brilliantly captured the cruel life of the downtrodden in urban India. It successfully creates sympathy for slum dwellers who were otherwise grossly neglected in a society where middle class tremendously prospered after the country adopted a free market economy in the Nineties. The economic miracle of India, however, has not reached the bottom of the society as reflected in the struggle of slum dwellers in the movie.
It is not difficult to notice the reason behind accolades and laurel won by 'Slumdog' in the West. This is not the first time films based on poverty were loved by the Western audiences who are used to identify India with poverty and cows. In the Sixties and Seventies Satyajit Ray's classics, such as, 'Apur Sansar' won accolades in European film festival circuits while Indian commercial cinema that always portrayed the victory of poverty over wealth, honesty over crookedness in its own crude formulas, vehemently protested against the attitudes of critics to ridicule them for being escapists. However, even Satyjit Roy's artistic portrayal of rural India was never recognized by the Oscars or Golden Globes of Hollywood until his final days. An Oscar was awarded to Ray for his lifetime achievement that he accepted from his hospital bed.
'Slumdog' is a poor and rough treatment of poverty. It looks at the harsh and cruel life in slums without any feelings. An emotionless treatment on screen appears to be selling the wretchedness of poor to the Western mindset so that the audience got some fun sitting in a theater. Unlike Satyajit Ray or Shyam Benegal of India or even Fellini of Italy, the movie never desires to look at the reasons behind those who have been left behind in a country that sat conveniently in the political and economic framework of US policies.
The British filmmaker Danny Boyle who is known for his talent to bring laughter amidst tragedy, celebrates the success of his movie that sells poverty and misery to entertain the West, even though it was made by a majority of its Indian case and crew, whose characters speak Hindi and dance at the tune of celebrated Indian music director A. R. Rahman.
Sunday, January 11, 2009
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का अमेरिकी मॉडल
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3953087.cms
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Navbharat Times - Breaking news, views. reviews, cricket from across India
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का अमेरिकी मॉडल 9 Jan 2009, 1000 hrs IST,नवभारत टाइम्स
न्यू जर्सी से अशोक ओझा
अमेरिका में रहने वाले हर व्यक्ति के पास ड्राइविंग लाइसंस होना निहायत जरूरी है। अगर आपके पास ड्राइविंग लाइसंस नहीं है, तो आप न तो नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते हैं ना ही बैंक में अकाउंट खोल सकते हैं। ड्राइविंग लाइसंस के बिना हवाई यात्रा और लंबी दूरियों की ट्रेनों में सफर करना भी मुश्किल है। दूसरी तरफ अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग के लिए, जिसकी स्थापना 9/11 के बाद हुई थी, ड्राइविंग लाइसंस एक ऐसा माध्यम है जिससे देश में गैरकानूनी तौर पर रहने वालों की खोजबीन की जा सकती है। वहां पुराने या नकली ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने पर कई लोगों को हवाई यात्रा से प्रतिबंधित किया जा चुका है। नकली ड्राइविंग लाइसेंस धारक को पहले जेल भेजा जाता है, बाकी कार्रवाई बाद में होती है। होमलैंड सिक्युरिटी डिपार्टमंट ने ड्राइविंग लाइसंस जारी करने या पुराने लाइसंस का नवीनीकरण के नियमों को इतना सख्त कर दिया है कि अब कम से कम पांच सबूत या पहचान पेश करने के बाद ही लाइसंस दिया जा सकता है। होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग के तहत अप्रवास विभाग और न्याय विभाग भी शामिल किए गए हैं, ताकि एक ही छत के नीचे हर तरह के आप्रवासी मामलों की सुनवाई की जा सके अथवा गैरकानूनी ढंग से रहने वालों का पता लगाया जा सके। यह विभाग आंतरिक सुरक्षा के लिए नियमित रूप से तौर तरीके बनाता है, जिनमें ट्रेन स्टेशन पर सामान्य नागरिक का बैग चेक करने से लेकर भीड़भाड़ वाले इलाकों में न्यूक्लियर हथियारों तक का पता लगाने के लिए आधुनिक उपकरणों की स्थापना करना भी शामिल है। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की तैयारी इस हद तक है कि देश की हवाई सीमा का उल्लंघन करने वाले किसी भी विमान को वहां के लड़ाकू जेट पांच मिनट के भीतर घेर सकते हैं और निर्देशों का पालन न करने पर उसे मार गिरा सकते हैं। मुंबई में आतंकी हमलों और आतंकवादियों के नापाक इरादों को देखते हुए क्या यह जरूरी नहीं हो जाता कि भारत में रहने वाले हर नागरिक की पहचान सुनिश्चित की जाए? भारत की आंतरिक सुरक्षा पर नजर डालें तो साफ होगा कि इतने बडे़ देश में कहां कौन रहता है- इसकी खबर पाना मुश्किल काम है। पर अगर जनगणना के दौरान एक-एक हिंदुस्तानी की गिनती की जा सकती है, तो सुरक्षा एजंसी अपने नागरिकों की पहचान क्यों नहीं कर सकती? क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि बडे़ शहरों में हवाई हमलों और सूटकेस बमों जैसे हथियारों की मौजूदगी का तुरंत पता लगाने की व्यवस्था बननी चाहिए? भारत-पाक में युद्ध की आशंका सचमुच भयावह है, क्योंकि ऐसा युद्ध आसानी से न्यूक्लियर युद्ध में बदल सकता है, जिसमें लाखों लोग बेमौत मारे जा सकते हैं। लेकिन जरा सोचें कि जो आतंकवादी मुंबई रेलवे स्टेशन पर आधे घंटे तक निहत्थे लोगों को गोलियों से भून सकते हैं, अगर उन आतंकियों के हाथ न्यूक्लियर हथियार लग जाएं, तो क्या होगा? क्या ऐसी स्थिति में वे न्यूक्लियर हथियार लेकर भारत की सीमा में घुसने से बाज आएंगे? साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण के दस साल बाद भी आतंकवादियों की मांग स्वीकार करते हुए उन्हें जेल से रिहा करने की कीमत भारत को मुंबई हमले के रूप में चुकानी पड़ी। मुंबई पर हमले के बाद भारत के राजनेताओं को सिर्फ कानून बनाकर चुप नहीं बैठ जाना चाहिए, बल्कि उन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए ठोस काम करना होगा। पर हमें आतंकवाद से जंग के एक और पहलू पर गौर करना चाहिए। 9/11 के दौरान जिस विमान को आतंकी वाइट हाउस से टकराना चाहते थे, वह पेंसिलवेनिया के जंगल में इस कारण ध्वस्त हुआ, क्योंकि उसके यात्री आतंकियों से जूझ पडे़ और विमान को वॉशिंगटन नहीं पहुंचने दिया। भारत एक ऐसे आतंकवाद से लड़ रहा है, जिसे एक पड़ोसी देश की सेना का समर्थन प्राप्त है। इसका सीधा अर्थ है कि देश को बाहरी और आंतरिक, दोनों मोर्चों पर उससे निर्णायक लड़ाई लड़नी है। पर साथ ही भारत के लोगों को यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि आतंकवाद कहीं भी आक्रमण कर सकता है, इसलिए नागरिकों को ऐसे हमले से बचने के लिए एक जागरूक सैनिक की तरह चौकस रहना होगा। भारत की तरह इस्राइल के आम नागरिक भी लंबे समय से आतंकी हमले के शिकार रहे हैं। 1972 में इस्राइल की ओलिंपिक टीम पर मुंबई की तर्ज पर हमला करके खिलाडि़यों को बंधक बनाया गया था। इस्राइल के समुद्री किनारों पर कई बार आतंकी हमलों में आम नागरिकों की जान गई है। 1979 में आतंकी गुट इस्राइल के विमान का अपहरण कर उसे युगांडा ले गए तो इस्राइल के कमांडो ने उसे उनके कब्जे से छुड़ा लिया। इस घटना के बाद इस्राइल ने हवाई सुरक्षा में एक मिसाल कायम की है। वहां के हवाई अड्डे दुनिया के सभी हवाई अड्डों में सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में, जब भारत- पाक सीमा पर युद्ध जैसे हालात हों, भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए। इस मामले में उसे इस्राइल और अमेरिका से बहुत कुछ सीखना है। बेशक, इस्राइल और अमेरिका- दोनों देशों में आंतरिक निगरानी के तौर तरीकों की आलोचना हुई है। इस्राइल की फलस्तीन नीति का विरोध बहुत से इस्राइली नागरिक भी करते हैं। इस्राइल अपनी नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग भी है। उधर, अमेरिका में कई निर्दोष लोगों को जेल में डाल दिया गया। इन सब गलतियों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस ने सरकार को यह अधिकार दे रखा कि वह किसी भी संदिग्ध नागरिक को जांच के दायरे में ला सकती है। भारत की सुरक्षा एजंसियों पर भी कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। पर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और ह्यूमन राइट्स के प्रति उसकी उदार दृष्टि और उसकी जागरूक न्याय व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि सुरक्षा एजंसियों की ज्यादतियों पर नियंत्रण रखा जा सके। जिस तरह कश्मीर में आतंकी हमलों पर काफी हद तक नियंत्रण करने का श्रेय भारत के सुरक्षाबलों को दिया जा सकता है, उसी तरह सक्षम एजंसियों को यह जिम्मेदारी भी सौंपनी चाहिए कि वे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों पर काबू पा सकें।
Tuesday, January 6, 2009
निष्ठा संविधान के प्रति
हाल ही में अमेरिका के इलिनोइस प्रदेश और भारत के उत्तर प्रदेश में दो ऐसी घटनाएं घटीं जो दोनों देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था का असली चेहरा सामने लाती हैं। गत माह अमेरिका की जांच एजेंसी एफबीआई ने इलिनोइस के गवर्नर राड ब्लागोजेविच को इस आशंका पर गिरफ्तार किया कि ब्लागोजेविच अमेरिकी सीनेट का उम्मीदवार नियुक्त करने के बदले लाखों डॉलर वसूलने वाले थे।राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार बनने के पहले बराक ओबामा इलिनोइस प्रदेश के शिकागो शहर से अमेरिकी सीनेट के सदस्य चुने गए थे। राष्ट्रपति पद के चुनाव में विजयी होने के बाद उन्हें सीनेट का पद छोड़ना पड़ा। इस खाली हुई सीनेट सीट पर नया उम्मीदवार चुनने की जिम्मेदारी इलिनोइस प्रदेश के गवर्नर राड ब्लागोजेविच की थी जिसकी भ्रष्ट आदतों से अमेरिका की जांच एजेंसी एफबीआई भलीभांति परिचित थी। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ओबामा की सीनेट सीट खाली हुई तो गवर्नर को फोन पर यह कहते सुना गया कि "इस सीट को मैं मुफ्त में नहीं जाने दूंगा।" गवर्नर ब्लागोजेविच को सीनेट की सीट को नीलाम करने के आरोप में एफबीआई ने उन्हें सुबह-सवेरे उनके घर जाकर गिरफ्तार किया। अब भारत का एक वाकया देखें। उत्तर प्रदेश में एक सरकारी कर्मचारी, पीडब्ल्यूडी विभाग के इंजीनियर, की हत्या के आरोप में मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी के एक विधायक को गिरफ्तार किया गया। मायावती वह नेता हैं जो लोगों से खुलेआम चंदा मांगती हैं अपने जन्मदिन के लिए। भारत के सबसे बड़े प्रदेश में अगर पीडब्ल्यूडी विभाग के इंजीनियर ने सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर ५० लाख रुपए की रकम चंदे में दी होती तो उसकी मौत न होती, न ही भ्रष्टाचार की यह खबर सामने आती।अमेरिका के लोकतंत्र और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में फर्क शायद यह भी है कि भ्रष्टाचार के प्रति दोनों देशों का प्रशासन अलग-अलग रास्ते अपनाता है। इलिनोइस प्रदेश के गवर्नर राड ब्लागोजेविच डेमोके्रटिक पार्टी के उभरते सितारे के रूप में जाने जाते थे। शिकागो शहर में ब्लागोजविच के भ्रष्ट तरीके काफी दिनों तक छुप न सके। उनके नवीनतम कारनामे उनका राजनीतिक जीवन ठप्प करने के लिए काफी हैं। इलिनोइस की विधायिका ब्लागोजेविच के खिलाफ महाभियोग (इंपीचमेंट) लाने वाली है।भारतीय संविधान में भी राजनेताओं की जांच की व्यवस्था है। यहां बिहार के चारा घोटाला की याद आती है जिसमें सीबीआई ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को मुख्य आरोपी करार दिया था। कई बार जेल की हवा खाने के बावजूद लालू आज भारत सरकार में एक वरिष्ठ मंत्री हैं। एक सुलझे हुए लोकतंत्र में इसकी गुंजाइश नहीं होती। भारत में यदि लोकतंत्र की जड़ें गहरी करनी हैं तो सरकारी अधिकारियों में संविधान के प्रति निष्ठा पैदा की जाए, सत्तारूढ़ दलों के प्रति नहीं।
Thursday, January 1, 2009
A conversation with Prakash Jha
Jha is a native of Bihar whose films, 'Damul', 'Mrityudand', 'Gangajal' and 'Apaharan', were all based on social issues of Bihar. A few years ago his involvement with his native land took a new dimension when he launched infrastructure development projects at a number of locations in Bihar.
I met him over lunch at a restaurant in Edison, NJ where I found Jha very comfortable with wine and mozzarella dishes. He demonstrated a mature understanding of the social and political situation of his native state, Bihar. He spoke about his industrial ventures as well as his rehabilitation projects.
I asked Jha why he was in USA. He said, "I am visiting USA to connect with people who could help in developing infrastructure for Bihar. Almost 30 percent of the population of Bihar, able bodied laborers and professionals, are working outside of the state because there are no opportunities available in the state. There is not a single industry in the state. I would like to reverse the trend of migration of the people of Bihar. I seek help from successful people settled in this country. "
What makes you think that progress and success is possible in a lawless state like Bihar?
Jha: If people of Bihar could succeed outside of Bihar, there is no reason why they can't do the same in their home state. The state has suffered due to incompetency of its leaders. Bihar produced very good politicians but not one who cared for its development-not even a rice mill was promoted by its leaders.
Thanks to Lallo Prasad Yadav's leadership, a sense of social equity was developed among the lower strata of people who have been oppressed since centuries. Lallo inspired the downtrodden to realize their potential but he, like other leaders, redeemed their trust to build his vote bank. He wasted his unchallenged leadership and ignored to set up industries or educational institutions. We never had a leader, such as Sharad Pawar, who founded cooperatives and educational institutions in Maharashtra.
Can you provide a blueprint of how you are involved in development of Bihar?
Jha: For the last five years I have been seriously engaged in development of Bihar. I have promoted a company called Maurya Sugar that is developing sugar factories in seventeen locations around the state. Another company promoted by me, P&M Infrastructure, is involved in developing multiplexes and agro-based industries. Both companies have a market valuation of more than three hundred crores rupees. I am working to develop successful industrial ventures so that examples are set for attracting investors and entrepreneurs. I want to convince people that Bihar is not a barren place. It is a place where new enterprises can succeed. In order to make this happen, entrepreneurs born in Bihar should return to their native place and engage in development and profit making.
Many good filmmakers don't see profit making as the goal of their work. On the contrary, they consider the objective of profiteering from films as an obstruction in quality filmmaking.
Jha: I don't see a conflict between a good film and a financially successful film. When I produced 'Mrityudand', I had to cope with a budget of Rs. 70 lakhs. I had to design a project that could attract crowd at box office. I had to incorporate songs and dance but the basic structure of the movie was not changed. It was focused to make a statement and leave imprints on the mind of viewers.
After the success of 'Mrityudand', I made even bigger films, 'Gangajal', and then 'Apaharan'. I am not shy of profit making. A filmmaker aims at making a movie that should be seen by as many people as possible.
How is your charitable organization doing?
Jha: Three months after the floods inundated parts of Bihar, my organization, 'Punarwaas', is working to help more than five thousand people who had no place to go. While other relief organizations have folded up we are expanding our activities. We are trying to help the flood victims find resources to support their families. I am grateful to Indians residing in the US for inviting me and supporting 'Punarwaas'. Earlier I visited California where settlers from Bihar raised funds for the organization. We are truly energized by this grand gesture on part of our brothers and sisters in USA.
Political Corruption in India and the USA
What we miss in newspapers is the way government officers and political leaders help each other in raising funds for puposes not related with administration. And when the relations between them go wrong crime stories make headlines. What has gone wrong in the half a century long democratic journey of the Indian society?
More than a decade ago, another icon of the Indian lower class, Laloo Prasad Jadav, now a senior minister in the central government, was charged with financial wrong doings. The courts never found enough evidence to convict him. Prakash Jha, a filmmaker-cum-social activist-cum-industrialist of Bihar, would credit Jadav for uplifting the morale and self-esteem of the oppressed class in Bihar. However, I feel that the prospect of social change in the traditionally backward region of India didn't really proceed in the right direction. Somewhere down the line, the process of change was hijacked by forces of vested-interest and greed of the leaders.
It is for social scientists to analyse and tell us if the democracy in India failed to strengthen the democratic institutions that were prohibited by the electoral system to perform its duty in order to carry forward the desired objectives of the Indian constitution?
We must look at the nature of judicial forces at work in America that boasts of a fully developed system to curb incidents of corruption, ethical and moral wrongdoings by public personalities. The Governor of Illinois, Blagojevich is under investigation by FBI for allegedly trying to auction the Senate seat vacated by the resignation of President-elect Barack Obama. Blagojevich is now an untouchable in the Democratic party, even if he has moved forward to appoint Roland Burris to the Senate seat. I think United States has a system in place where investigative agencies enjoy a free hand when it comes to probe public figures.
It is important to note the case of sexual harassment filed by a former secretary working in the New York city government against the Department for the aging Commissioner, who recently resigned. It reflects that justice is not easy to achieve. The former secretary, Auritela Santos, according to a news report published in the New York Times, who worked for the commissioner Mendez-Santiago, said in her lawsuit that he harassed her with sexual remarks and that he had sex with subordinates in his office while she was sitting at her desk nearby.
This story had gone unnoticed except that the lawsuit has been settled by NY City for a sum of $2,50,000 but the wrongdoings were denied by the officer. The news report itself was tucked in the inside pages of the paper.
It is fair to say that in spite of the powerful enforcing agencies and options available to victims of abuse or discrimination, not all such instances see the daylight in America. It is fair to say that most cases of daily discrimination in the Indian society fail to attract public attention or grab headlines in the vibrant news media of India.