Published in 17 Jan-2009 Print Edition of नईदुनिया
(यह लेख नई दुनिया के लिए मैंने लिखा था।)
अपना मकान, गाड़ी और एक नौकरी- अमेरिका के लोगों के ये तीन सपने आज संकट में हैं। एक जमाना था जब अमेरिका में अमीरों की पहचान इस बात से होती थी कि उनके पास कितनी मोटर गाड़ियां हैं। सन १९७० के दशक में सिर्फ छह प्रतिशत अमेरिकी परिवारों के पास तीन या उससे अधिक कारें थी जबकि सन् २००० तक तीन से अधिक गाड़ियां रखने वाले परिवारों का प्रतिशत १८ तक पहुंच गया। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार अमेरिका में लाइसेंस प्राप्त ड्राइवर की संख्या होगी कुल २०।२० करोड़, जबकि यहां की सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों की संख्या २४।४० करोड़ है।
जैसे-जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आसान किस्तों पर कार खरीदने का चलन बढ़ने लगा, एक औसत मध्यम वर्ग परिवार की कार पर निर्भरता भी बढ़ने लगी। पति-पत्नी की अपनी-अपनी कार होना आम बात हो गई, ऊपर से सामान ढोने के लिए एक पिक-अप ट्रक और अगर परिवार में बच्चे हैं तो एक मिनी वैन से जिंदगी थोड़ी आरामदेह लगने लगी। दशकों तक अमेरिका में एक गैलन पेट्रोल की कीमत कोका कोला की कीमत से अधिक नहीं थी जिससे अमेरिकियों का अधिकांश समय उनकी गाड़ियों में बीतने लगा। गाड़ियों में मनचाही जगहों का सफर जीवन शैली का एक अंग बन गया।
साल २००८ के दौरान अमेरिका में आर्थिक तंगी की आंधी आई, उसने अमेरिकी मध्यम वर्ग की जीवन शैली में उथल-पुथल ला दी । कठोर मेहनत से अपने सपने साकार करने वाला अमेरिकी मध्यम वर्ग अब उससे बचने लगा है। ज्यादा गाड़ी रखना अमीरी की पहचान नहीं, गरीबी को आमंत्रण साबित हो रहा है। नए मॉडल की कार चलाने के शौकीन अमेरिकी अब सस्ती और टिकाऊ कार खरीदकर ज्यादा दिनों तक चलाना चाहते हैं। हर दूसरे-तीसरे साल नए मॉडल बदलने की संस्कृति अब आर्थिक संकट पर कुर्बान हो चुकी है। लाखों की संख्या में बेरोजगार हो रहे लोगों के सामने आमदनी के नए रास्ते ढूंढ़ना गाड़ियां खरीदने से ज्यादा जरूरी हो गया।
अमेरिका की तीन बड़ी कार उत्पादक कंपनियां जीएम, फोर्ड और चर्सलर के मॉडल शो रूम बैठे रहे ग्राहकों के इंतजार में। अमेरिकी रहन-सहन को परिभाषित करने वाली यह तीन कार उत्पादक कंपनियां आर्थिक मंदी की चपेट में ऐसी आई कि बुश सरकार को उनकी राहत के लिए १४ अरब डॉलर का कर्ज मंजूर करना पड़ा। कहा जाने लगा कि यदि फोर्ड, चर्सलर और जीएम को बचाया नहीं गया तो यह कंपनियां दिवालिया हो जाएंगी जिसके कारण कार उद्योग से जुड़े विक्रेता और सर्विस एजेंसियां भी बंद हो जाएंगी। करोड़ों लोगों की बेरोजगारी की भयावह तस्वीर से डर कर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ओबामा ने भी बुश की आर्थिक सहायता योजना का समर्थन किया।
न्यूजर्सी के सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैली "जर्सी गार्डन" नामक शॉपिंग मॉल में गाड़ियों की भीड़ से ट्रेफिक जाम दिखता है। इसका यह अर्थ नहीं की जनता खूब खरीदारी कर रही है। खर्च करने के लिए सैकड़ों डिजाइनर शॉप और डिस्काउंट स्टोर्स के भारी "जर्से गार्डन" में गाड़ियों की भरमार अमेरिकी की अमीरी की नहीं उसकी गरीबी की पहचान बन रही है। जैसे ही हम मॉल में घुसते हैं, लोगों की भीड़ उन दुकानों में दिखती है जहां डिस्काउंट रेट पर कपड़े या जरूरी उपयोग की चीजें बिकती हैं।
सस्ते दाम पर दैनिक उपयोग की चीजें बेचने वाली दुकानों में आधे दाम पर सामान मिलने लगा है। अपनी पुरानी गाड़ी में बैठकर मॉल तक पहुंचे गरीब लोगों की भीड़ इन्हीं दुकानों में ज्यादा दिख रही है। कुछ दुकानों ने सभी नए ग्राहकों को दस डालर के कूपन देना शुरू किया ताकि ग्राहक अपनी मर्जी के सामान सस्ते में खरीद सकें।
दिवालिया होने से बचने के ढेरों किस्म के तरीके दुकानदार अपना रहे हैं। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कुछ दुकानों ने "एक के साथ एक मुफ्त" यानि "एक खरीदो, दूसरा मुफ्त पाओ" का अभियान चला रखा है। इन दुकानों की तरह कैलीफोर्निया के एक कार डीलर ने कार की बिक्री बढ़ाने के लिए, "एक कार खरीदो, दूसरी मुफ्त पाओ" जैसे मार्केटिंग अभियान का सहारा लिया।
पैसा बचाने की कोशिश में लोग महंगे रेस्टोरेंट में जाने से कतराने लगे हैं। सस्ते भोजन की तलाश में एमसी डोनाल्ड जैसे फास्ट फूड रेस्टोरेंट में जाना बेहतर समझते हैं। यह रेस्टोरेंट अमेरिका की उन सौभाग्यशाली कंपनियों में हैं जिनका कारोबार मुनाफे के साथ चल रहा है।
गरीबी बेतहाशा बढ़ रही है। अकेले २००८ साल में ही करीब २५ लाख लोग बेरोजगार हो चुके हैं। नव निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तेजी से बढ़ती बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए जन-प्रतिनिधियों को आगाह किया है कि वे करीब ८०० अरब डॉलर की योजना को जल्दी मंजूरी दें। इस राशि का लगभग आधा हिस्सा नई नौकरियों के लिए खर्च किया जाएगा। ओबामा नई नौकरियां देने वाले बिजनेस और उद्योगों को टैक्स राहत देना चाहते हैं तथा आम नागरिकों को कुछ टैक्स राशि वापस देने की पेशकश कर रहे हैं। स्कूलों की मरम्मत और दूसरे विकास कार्यों के लिए भी भारी धनराशि खर्च करने की योजना है।
फिलहाल अमेरिकी जनता उन दिनों की याद कर रही है जब सन १९२० के बाद भारी मंदी आई थी। न्यूयार्क शहर में लोग ठंड से बचने के लिए अपने जूतों में कागज ठूंस लेते थे। अपने घरों में लकड़ी जलाने को विवश लोग गैस चूल्हे का खर्च सहन करने में असमर्थ थे। डर यह है कि कहीं फिर से वही बुरे दिन लौटकर न आएं। वरना बड़ी मेहनत से बनाए सपने टूट कर बिखरते नजर आएंगे।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और अमेरिका में हैं)
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