http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3953087.cms
Printed from
Navbharat Times - Breaking news, views. reviews, cricket from across India
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का अमेरिकी मॉडल 9 Jan 2009, 1000 hrs IST,नवभारत टाइम्स
न्यू जर्सी से अशोक ओझा
अमेरिका में रहने वाले हर व्यक्ति के पास ड्राइविंग लाइसंस होना निहायत जरूरी है। अगर आपके पास ड्राइविंग लाइसंस नहीं है, तो आप न तो नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते हैं ना ही बैंक में अकाउंट खोल सकते हैं। ड्राइविंग लाइसंस के बिना हवाई यात्रा और लंबी दूरियों की ट्रेनों में सफर करना भी मुश्किल है। दूसरी तरफ अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग के लिए, जिसकी स्थापना 9/11 के बाद हुई थी, ड्राइविंग लाइसंस एक ऐसा माध्यम है जिससे देश में गैरकानूनी तौर पर रहने वालों की खोजबीन की जा सकती है। वहां पुराने या नकली ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने पर कई लोगों को हवाई यात्रा से प्रतिबंधित किया जा चुका है। नकली ड्राइविंग लाइसेंस धारक को पहले जेल भेजा जाता है, बाकी कार्रवाई बाद में होती है। होमलैंड सिक्युरिटी डिपार्टमंट ने ड्राइविंग लाइसंस जारी करने या पुराने लाइसंस का नवीनीकरण के नियमों को इतना सख्त कर दिया है कि अब कम से कम पांच सबूत या पहचान पेश करने के बाद ही लाइसंस दिया जा सकता है। होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग के तहत अप्रवास विभाग और न्याय विभाग भी शामिल किए गए हैं, ताकि एक ही छत के नीचे हर तरह के आप्रवासी मामलों की सुनवाई की जा सके अथवा गैरकानूनी ढंग से रहने वालों का पता लगाया जा सके। यह विभाग आंतरिक सुरक्षा के लिए नियमित रूप से तौर तरीके बनाता है, जिनमें ट्रेन स्टेशन पर सामान्य नागरिक का बैग चेक करने से लेकर भीड़भाड़ वाले इलाकों में न्यूक्लियर हथियारों तक का पता लगाने के लिए आधुनिक उपकरणों की स्थापना करना भी शामिल है। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की तैयारी इस हद तक है कि देश की हवाई सीमा का उल्लंघन करने वाले किसी भी विमान को वहां के लड़ाकू जेट पांच मिनट के भीतर घेर सकते हैं और निर्देशों का पालन न करने पर उसे मार गिरा सकते हैं। मुंबई में आतंकी हमलों और आतंकवादियों के नापाक इरादों को देखते हुए क्या यह जरूरी नहीं हो जाता कि भारत में रहने वाले हर नागरिक की पहचान सुनिश्चित की जाए? भारत की आंतरिक सुरक्षा पर नजर डालें तो साफ होगा कि इतने बडे़ देश में कहां कौन रहता है- इसकी खबर पाना मुश्किल काम है। पर अगर जनगणना के दौरान एक-एक हिंदुस्तानी की गिनती की जा सकती है, तो सुरक्षा एजंसी अपने नागरिकों की पहचान क्यों नहीं कर सकती? क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि बडे़ शहरों में हवाई हमलों और सूटकेस बमों जैसे हथियारों की मौजूदगी का तुरंत पता लगाने की व्यवस्था बननी चाहिए? भारत-पाक में युद्ध की आशंका सचमुच भयावह है, क्योंकि ऐसा युद्ध आसानी से न्यूक्लियर युद्ध में बदल सकता है, जिसमें लाखों लोग बेमौत मारे जा सकते हैं। लेकिन जरा सोचें कि जो आतंकवादी मुंबई रेलवे स्टेशन पर आधे घंटे तक निहत्थे लोगों को गोलियों से भून सकते हैं, अगर उन आतंकियों के हाथ न्यूक्लियर हथियार लग जाएं, तो क्या होगा? क्या ऐसी स्थिति में वे न्यूक्लियर हथियार लेकर भारत की सीमा में घुसने से बाज आएंगे? साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण के दस साल बाद भी आतंकवादियों की मांग स्वीकार करते हुए उन्हें जेल से रिहा करने की कीमत भारत को मुंबई हमले के रूप में चुकानी पड़ी। मुंबई पर हमले के बाद भारत के राजनेताओं को सिर्फ कानून बनाकर चुप नहीं बैठ जाना चाहिए, बल्कि उन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए ठोस काम करना होगा। पर हमें आतंकवाद से जंग के एक और पहलू पर गौर करना चाहिए। 9/11 के दौरान जिस विमान को आतंकी वाइट हाउस से टकराना चाहते थे, वह पेंसिलवेनिया के जंगल में इस कारण ध्वस्त हुआ, क्योंकि उसके यात्री आतंकियों से जूझ पडे़ और विमान को वॉशिंगटन नहीं पहुंचने दिया। भारत एक ऐसे आतंकवाद से लड़ रहा है, जिसे एक पड़ोसी देश की सेना का समर्थन प्राप्त है। इसका सीधा अर्थ है कि देश को बाहरी और आंतरिक, दोनों मोर्चों पर उससे निर्णायक लड़ाई लड़नी है। पर साथ ही भारत के लोगों को यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि आतंकवाद कहीं भी आक्रमण कर सकता है, इसलिए नागरिकों को ऐसे हमले से बचने के लिए एक जागरूक सैनिक की तरह चौकस रहना होगा। भारत की तरह इस्राइल के आम नागरिक भी लंबे समय से आतंकी हमले के शिकार रहे हैं। 1972 में इस्राइल की ओलिंपिक टीम पर मुंबई की तर्ज पर हमला करके खिलाडि़यों को बंधक बनाया गया था। इस्राइल के समुद्री किनारों पर कई बार आतंकी हमलों में आम नागरिकों की जान गई है। 1979 में आतंकी गुट इस्राइल के विमान का अपहरण कर उसे युगांडा ले गए तो इस्राइल के कमांडो ने उसे उनके कब्जे से छुड़ा लिया। इस घटना के बाद इस्राइल ने हवाई सुरक्षा में एक मिसाल कायम की है। वहां के हवाई अड्डे दुनिया के सभी हवाई अड्डों में सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में, जब भारत- पाक सीमा पर युद्ध जैसे हालात हों, भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए। इस मामले में उसे इस्राइल और अमेरिका से बहुत कुछ सीखना है। बेशक, इस्राइल और अमेरिका- दोनों देशों में आंतरिक निगरानी के तौर तरीकों की आलोचना हुई है। इस्राइल की फलस्तीन नीति का विरोध बहुत से इस्राइली नागरिक भी करते हैं। इस्राइल अपनी नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग भी है। उधर, अमेरिका में कई निर्दोष लोगों को जेल में डाल दिया गया। इन सब गलतियों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस ने सरकार को यह अधिकार दे रखा कि वह किसी भी संदिग्ध नागरिक को जांच के दायरे में ला सकती है। भारत की सुरक्षा एजंसियों पर भी कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। पर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और ह्यूमन राइट्स के प्रति उसकी उदार दृष्टि और उसकी जागरूक न्याय व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि सुरक्षा एजंसियों की ज्यादतियों पर नियंत्रण रखा जा सके। जिस तरह कश्मीर में आतंकी हमलों पर काफी हद तक नियंत्रण करने का श्रेय भारत के सुरक्षाबलों को दिया जा सकता है, उसी तरह सक्षम एजंसियों को यह जिम्मेदारी भी सौंपनी चाहिए कि वे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों पर काबू पा सकें।