Monday, May 25, 2009

क्यूबा में बहने लगी नई बयार

नवभारत टाईम्स, २ मई:
अमेरिका के दक्षिणी प्रदेश फ्लोरिडा के कीवेस्ट द्वीप से लगभग एक सौ मील दूर बसा क्यूबा
पिछली आधी शताब्दी से अमेरिकी विदेश नीति की वर्ण व्यवस्था में अछूत की तरह खड़ा है। दोनों देशों के बीच 1961 से ही कोई कूटनीतिक संपर्क नहीं है। फिदेल कास्त्रो की साम्यवादी तानाशाही के कारण क्यूबा से विस्थापित होकर अमेरिका और खासकर मियामी शहर में बसे लाखों आप्रवासी अपनी मातृभूमि जाने से वंचित थे। उन्हें यह भी छूट हासिल नहीं थी कि वे अपने परिवार वालों को पैसे भेज सकें, जैसा कि अमेरिका के ज्यादातर आप्रवासी करते हैं। अमेरिका ने क्यूबा पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे थे। पर 13 अप्रैल से इस स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आ गया है। असल में बराक ओबामा ने घोषणा की है कि अब से क्यूबा मूल के आप्रवासी न सिर्फ अपनी मातृभूमि की यात्रा कर सकते हैं, बल्कि अपने परिवार को पैसे भी भेज सकते हैं। इससे क्यूबा मूल के वे आप्रवासी बेहद प्रसन्न हैं, जिनके परिवार के सदस्य क्यूबा में हैं।

क्यूबा के अप्रवासियों के लिए अपने देश में पैसा भेजने की छूट एक बड़ी सुविधा है। अमेरिका में रहने वाले फिदेल कास्त्रो के घोर विरोधी क्यूबावासी कास्त्रो को दंडित करने की मांग वर्षों से करते आ रहे थे, लेकिन अब वे ओबामा की नई नीति का खुल कर स्वागत कर रहे हैं।

ओबामा के इस फैसले से 2004 में भूतपूर्व राष्ट्रपति बुश द्वारा लगाई गई आर्थिक नाकाबंदी ढीली पड़ गई है। इससे दोनों देशों के बीच नया दौर तो शुरू हुआ ही है, अमेरिका और दक्षिण के गरीब देशों को यह संदेश भी मिला है कि वॉशिंगटन दक्षिण के गैर पूंजीवादी देशों के साथ तनाव कम करना चाहता है और उनके साथ अच्छे पड़ोसी का व्यवहार करना चाहता है। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का रवैया मोहल्ले के उस दादा की तरह था, जो अपने पड़ोसियों को धमकाता रहता है। ग्रेनाडा में अमेरिकी सैनिकों को भेजने की रोनाल्ड रेगन की नीति और पनामा के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर मियामी की जेल में कैद करने का कदम ऐसी ही नीति का अंग था। अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अमेरिकी-महादेश के किसी भी कोने में बेरोकटोक सैनिक कार्रवाई करता रहा है।
बुश के शासनकाल में मेक्सिको सहित तमाम दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ अमेरिका की नीति में बेहद तनाव आ गया था। फिदेल कास्त्रो के सबसे बड़े प्रशंसक बन कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्युगो चावेज अमेरिका को चुनौती दे रहे थे। ब्राजील के लोकप्रिय राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा अमेरिका के बदले भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के ज्यादा नजदीक जा रहे थे। अमेरिका में मेक्सिको से आए अनधिकृत अप्रवासियों के साथ बुरा सलूक किए जाने के कारण मेक्सिको-अमेरिका के बीच भी तनाव काफी बढ़ गया था।
क्यूबा के प्रति अमेरिकी रुख में बदलाव ओबामा की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग है, जिसे वे अपने चुनाव प्रचार के दौरान रेखांकित कर चुके हैं। दुनिया के अमेरिका-विरोधियों से मुंह न मोड़ कर उनके साथ बात करने की नीति को वे कमजोरी नहीं मानते। 9/11 के बाद बुश की नीतियों से दुनिया भर में अमेरिका की छवि धूमिल हुई है, इस छवि को ओबामा सुधारना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि दुनिया अमेरिका को एक सहयोगी राष्ट्र के रूप में देखे, न कि एक ऐसे ताकतवर देश की तरह जो अपनी बात मनवाने के लिए जबरदस्ती करता रहता है।
अमेरिका और क्यूबा के बीच कड़वाहट का इतिहास साठ साल से भी ज्यादा पुराना है। 1959 में फिदेल कास्त्रो ने क्रांतिकारी विद्रोह की ताकत से देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली। लेनिन और मार्क्स की विचारधारा से प्रेरित कास्त्रो ने निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और अमेरिकी आयात पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए। संबंध इतने खराब हो गए कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने क्यूबा पर स्थायी प्रतिबंध (अम्बर्गो) लगाने की घोषणा कर दी।
सन 1962 के उन दिनों में क्यूबा में सोवियत मिसाइल लगाने के सवाल पर सोवियत राष्ट्रपति ख्रुश्चेव और अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनडी के बीच टकराव इस हद तक पहुंच गया था कि उसका अंजाम तीसरे विश्व युद्ध के रूप में हो सकता था। आणविक हथियारों से लैस दुनिया की दो महाशक्तियां एक दूसरे की चाल का जवाब देने के लिए तैयार थीं। अमेरिका की खुफिया एजंसियों ने खबर दी कि सोवियत संघ ने क्यूबा की धरती पर न्यूक्लियर मिसाइल स्थापित कर दी है तो अमेरिकी विदेश विभाग ने क्यूबा पर आक्रमण करने की सलाह राष्ट्रपति कैनडी को दी। लेकिन धैर्य और कूटनीति का सहारा लेते हुए कैनेडी ने क्यूबा की नौसैनिक घेरेबंदी का निर्णय किया, जिसके एक सप्ताह बाद ही ख्रुश्चेव को मिसाइल हटा लेने की घोषणा करनी पड़ी।
तब से फिदेल कास्त्रो और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ते ही चले गए। कास्त्रो ने अमेरिका को साम्राज्यवादी देश कहकर सोवियत रूस कैंप में शरण ली, तो सीआईए ने कास्त्रो को मार डालने के लिए क्यूबन आप्रवासियों के गिरोह हवाना भेजने से लेकर कास्त्रो के लिए सिगार में विस्फोटक डालने तक की साजिश रची। लेकिन कास्त्रो अभी तक जिंदा हैं और अब देश का शासन उन्होंने अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप रखा है।
फिलहाल ओबामा के लचीलेपन की नीति का अर्थ सिर्फ इतना है कि वे हवाना को बताना चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर बनाने की अगली पहल क्यूबा को करनी होगी। अमेरिका चाहता है कि क्यूबा लोकतंत्र का रास्ता पकडे़। वहां राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए और मानवाधिकारों का उल्लंघन बंद हो। एक जमाने में क्यूबा अमेरिका की आंख की किरकिरी था। आज हालात बदल चुके हैं। कास्त्रो सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं। सोवियत संघ बिखर चुका है। क्यूबा अपनी गरीबी का बोझ झेलने के काबिल नहीं। वह अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्त होना चाहता है।
अमेरिका के लिए क्यूबा से अधिक महत्वपूर्ण दूसरे मुद्दे हैं। वह चावेज को काबू में करना चाहता है और कोलंबिया से मेक्सिको तक फैले नशीले पदार्थों के विशाल साम्राज्य को समाप्त करना चाहता है। इसके लिए ओबामा इन देशों से टकराव के बदले उनका सहयोग लेना बेहतर समझते हैं।

मानवता के हत्यारों से क्या सबक लें?

प्रभात ख़बर में प्रकाशित:

तीस वर्ष पहले दक्षिण पूर्व एशिया के देश कम्बोडिया में नरसंहार का नंगा नाच हो रहा था. चीन के सहयोग से सत्ता में आयी ख्मेर रुज शासकों ने साम्यवाद स्थापित करने का आसान तरीका खोज निकला था. पोल पोट के नेतृत्व में न केवल देश की राजधानी नोम पेन्ह खली कराई गयी बल्कि शिक्षक से लेकर डॉक्टर तक देश के पढ़े लिखे लोगों की पूरी आबादी को सिलसिलेवार ढंग से मौत के घाट उतारने का कार्यक्रम १९७५ से ले कर १९७९ तक चलता रहा. इन चार वर्षों में सत्रह लाख लोग या तो मार दिए गए या लेबर कैंप में भूख, बिमारी से उनकी मौत हो गयी.
इतिहास बताता है कि साठ के दशक में वियतनाम में अमेरिका ने साम्यवाद से लड़ने के लिए जो युद्ध छेड़ा था उसका उपसंहार कम्बोडिया में हुआ जहाँ साम्यवाद के नाम पर लाखों लोगों की बलि चढाई गयी. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे भयंकर नर संहार था जिसे रोकने की कोशिश युनाइटेड नेशन्स सहित दुनिया के किसी देश ने नहीं किया. नब्बे के दशक में रवांडा और बोस्निया में भी ऐसा ही नर संहार हुआ जिसे होने देने के लिए युनाइटेड नेशन्स के सदस्य देश जिम्मेदार हैं. बहरहाल, यहाँ चर्चा सिर्फ कम्बोडिया की:
नब्बे के दशक में ही युनाइटेड नेशन्स की पहल पर कम्बोडिया में साझे की सरकार बनी जिसमे ख्मेर रुज से अलग होकर कई नेता सत्ता में आ गए. खेमर रुज के कातिल नेता वर्षो तक जँगलों में छिपे रहे. लम्बे समय तक आना कानी के बाद कम्बोडिया के नेता कातिलों पर मुक़दमा चलने के लिए सहमत हुए. खेमर रुज के चार बड़े नेता जेल में डाले गए जिनपर अब जाकर मुक़दमा शुरू हुआ है.
गत ३० मार्च को जिस खेमर रुज नेता पर मुक़दमा शुरू हुआ उसका नाम है kaing Guek Eav जिसे डोइक (Duch) के नाम से जाना जाता है. ६६ वर्षीय डोइक पर १४ हज़ार लोगों को क्रूरता पूर्वक मौत के घाट उतारने का आरोप है जिसके लिए उसपर मानवता के खिलाफ अपराध करने का मामला चलाया जा रहा है. १९७९ में वियतनाम ने कम्बोडिया पर आक्रमण किया तब डोइक जँगलों में भाग गया और १९९७ तक क्रिस्चियन मिसनरी में नाम बदल कर शिक्षक बन कर काम करता रहा. ब्रिटिश लेखक निक डनलप ने डोइक का पता लगाया और उससे मुलाकात का ब्यौरा अपनी पुस्तक, 'द लोस्ट एक्सेकुशनेर' (The lost executioner) में प्रकाशित किया. उस मुलाकात में डोइक नें अपना अपराध कबूल किया था और कम्बोडिया की जनता से माफ़ी मांगी थी.
एक बार फिर डोइक नें अमानवीय अपराधिक अदालत में कबूल किया है कि उसने अपने बड़े अधिकारियों के आदेश पर काम किया. "अगर में कैदियों को मारता नहीं तो मुझे ही मार डाला जाता", उसका बयान है.
सामूहिक नरसंहार करने वाले हत्यारे या यातना देने वालों को जब कठघरे में खडा होने का समय आता है तो वे अपने को निर्दोष साबित करने के लिए एक ही तर्क देते हैं: मैं तो सिर्फ आदेश का पालन कर रहा था.
जर्मनी के नाजी हों या बोस्निया और रवांडा के सैनिक, सभी अपने को भुक्तभोगी साबित करने के लिए कोई कसार नहीं छोड़ते. वे अपने आपको उनकी श्रेणी में रखने की कोशिश करते हैं जिन पर उन्होंने जुल्म ढाए थे. अक्सर वे भुक्ताभोगियों या चस्मादीद गवाहों के बयानों को सरासर झूठ करार देने से भी नहीं चूकते.
हाला कि इस तर्क में सचाई भी हो सकती है कि यदि डोइक कैदियों को नहीं मारता तो उसे भी मरना पड़ता. जिस व्यवस्था का वह अंग था उसमे उसके पास कोई विकल्प नहीं था. लेकिन यह तर्क आततायी को निर्दोष करार देने के लिए काफी नहीं.
डोइक का बयान न सिर्फ कम्बोडिया की जनता के लिए वरन पुरी दुनिया के सामने कुछ सवाल खड़े करता है. ख्मेर रुज के चार और बड़े नेता जेल में कैद हैं और कठघरे में खड़े होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह हैं: पोल पोट सरकार में विदेश मंत्री इएंग सारी (Ienge Sary), नुएँ चेया (नुओं चेया), जिसे ब्रदर नंबर दो कहते थे (स्वयं पोल पोट ब्रदर नंबर एक था.), राष्ट्र प्रमुख खिऊ सम्फान (Khieu Samphan), और ख्मेर रुज का सामाजिक मामलों का मंत्री इएंग तिरिथ (Ieng Thirith).
अगर इन पांचो को नरसंहार के लिए दोषी ठहरा भी दिया जाए तो क्या फर्क पड़ेगा?
एक अनुमान के अनुसार कम्बोडिया की आबादी का सत्तर प्रतिशत तीस वर्ष से कम आयु की है. इस पीढी को ख्मेर रुज की कहानी भूत प्रेत की कहानी से ज्यादा वास्तविक नहीं प्रतीत होती है. बड़े बूढे जब अपनी आप बीती बच्चों को सुनाने की कोशिश करते हैं तो वे उन्हें सुनने में रूचि नहीं लेते. ख्मेर रुज के अपराधियों पर मुकदमे की सुनवायी टेलिविज़न पर देखने में भी युवा पीढी को विशेष दिलचस्पी नहीं है. यह कैसी विडम्बना है कि खेमर रुज के सबसे बड़े कैदखाने, तोल स्लेंग के परिसर में जहाँ कभी हजारों लोगों की यातना पूर्वक हत्या हुई, आज बच्चे खलते हैं. वे अपने देश के इतिहास के इस घिनोने अध्याय से लगभग अपिरिचित हैं.
एक के बाद एक सामाजिक अशांति से जूझते रहने के कारण कम्बोडिया के लोगों को ख्मेर रुज की यातनाओं को भूला देना ही बेहतर लगा. तभी तो हत्यारा नेतृत्व कभी अपनी करनी का हिसाब देने की जरूरत नहीं समझा. कम्बोडिया की नई पीढी को वास्तविकता से अवगत करने की कोशिश न तो शासकों ने की न ही परंपरा ने. इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में प्राचीन ख्मेर रुज साम्राज्य की कहानी तो विस्तार से कही गयी है लेकिन पोल पोट के आतंक की कहानी को महत्व नहीं दिया गया.
यह सचमुच गर्व की बात है कि हिन्दू संस्कृति की छत्रछाया में ३० मील से भी ज्यादा दूरी में फैले अंगकोर समूह के मंदिर बौध और हिन्दू परंपरा के सजीव उदहारण के रूप में आज भी पर्वत की तरह खड़े हैं. यकीन नहीं होता कि उस महान ख्मेर के वंसज पोल पोट जैसे आततायी भी हो सकते हैं.
दुर्भाग्य की बात है कि कम्बोडिया के गुनाहगारों को वहां के समाज ने दोषी ठहराने की गंभीर कोशिश नहीं की. वहां शांति स्थापित न हो सकी. यहाँ तक कि १९९७ में फिर सैकडों लोग मारे गए जिनके खुनी कभी पकडे नहीं गए. आज हाल यह है कि देश के कुछ हिस्सों में आम जनता पुलिस की भूमिका खुद निभा लेती है अपराधियो को सजा देने के लिए. वर्षों की हिंसा सहने वाले समाज को यह भरोसा नहीं कि उन्हें सामाजिक न्याय मिल भी सकता हैं.
(यहाँ मैं सोचता हूँ बिहार और झारखण्ड के बारे में जहाँ न्याय की रक्षा करने वाले पुलिस थानों को लूटने और अपराधियों को सरेआम पीट पीट कर मार डालने की खबरें अक्सर सुनाई पड़ती हैं. बिहार और झारखण्ड में सामाजिक न्याय की बिगड़ती हालात को दुरुस्त करने की फिक्र आखिर किसको है?)
लेकिन दुनिया को यह बताना ज़रूरी है कि डोइक ने अपने कैदिओं को किस मानसिकता के तहत प्रताडित करने के बाद उनकी हत्या की. निक डनलप ने अपनी पुस्तक में अनेक ऐसे उदहारण दिए हैं जिनसे यह सबूत मिलता है की हत्यारों ने न केवल अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए कैदिओं की हत्या की वरन उसे इन जघन्य कामों को करते हुए आनंद बोध भी हुआ.
कम्बोडिया और दुनिया को यह समझाना बाकी है कि समाज में वे कौन सी मनःस्थिति बन जाती है कि एक डोइक पैदा होता है. मानवाधिकार मुकदमे की कार्रवाई को अंजाम देना इसलिए ज़रूरी है कि यह मालूम हो सके कि बगुनाह लोगों को मारने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कैसी थी, ताकि लोग अतीत के काले अध्याय से सबक ले सकें. दुनिया और ख़ास कर कम्बोडिया की जनता को यह बताना जरूरी है ताकि फिर डोइक पैदा न हो!
१९९५ में अमेरिका के येल (yale) युनिवर्सिटी ने कम्बोडिया के नरसंहार से सम्बंधित दस्तावेज़ टायर करने का एक कार्यक्रम बनाया जिसके तहत तोल संग कैदिओं के बारे में जानकारी और फोटो एकत्र किया गए. ये दस्तावेज़ मानवता के खिलाफ अपराधिक अदालत में भी पेश किये जायेंगे. कम्बोडिया की जनता को उनके इतिहास के काले अध्याय के बारे में जानकारी देने की दिशा में येल का यह योगदान महत्वपूर्ण है.