Wednesday, February 4, 2009

गांधी, मार्टिन लूथर किंग और ओबामा

Published in 31 Jan-2009 Print Edition of नईदुनिया
ओबामा के राष्ट्रपति बनने से मार्टिन लूथर किंग का सपना अभी पूरा नहीं हो गया है । बराबरी और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए पिछली सदी में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद को जो चुनौती दी थी वह आंशिक रूप में ही पूरी होती दिखाईदी है ।किंग का मानना था कि जिस संघर्ष की शुरुआत उन्होंने की है वह महात्मा गांधी के रास्ते पर चलते हुए ही सफल हो सकता है और वैसा मुमकिन होता जा रहा है ।

अशोक ओझा

संयोग ही है कि अमेरिका में अश्वेत लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए सत्याग्रह का बिगुल बजाने वाले नेता मार्टिन लूथर किंग के जन्मदिन के एक दिन बाद व्हाइट हाउस में अश्वेत प्रेसिडेंट ने प्रवेश कर देश का नेतृत्व संभाला।
चालीस साल पहले अश्वेत लोगों को बराबरी का हक दिलाने के लिए किंग ने असहयोग आंदोलन चलाया था। उन दिनों उनको नीग्रो कहा जाता था। अल्बामा प्रदेश के मोंटगुमरी नामक शहर में बस से सफर करने वाले अश्वेतों को आगे के दरवाजे से बस में आकर किराया देना पड़ता था, फिर नीचे उतर कर पिछले दरवाजे से बस में घुस कर अश्वेतों की सीट पर बैठना पड़ता था। अगर अश्वेत खंड में सीटें भर भी जाएं तो भी किसी अश्वेत यात्री को बस के अगले हिस्से में, जो श्वेत लोग की लिए आरक्षित होता था, बैठने की इजाजत नहीं थी, भले ही वे सीटें खाली क्यों न हों! यहां तक कि यदि बस के अगले हिस्से में सीटें भर गई हों और बस में कुछ और श्वेत लोग आ जाएं तो उनके लिए ड्राइवर अश्वेत यात्री को अपनी सीट से उठाने के लिए मजबूर करता था। उसके न उठने पर पुलिस बुलाई जाती जो अश्वेत यात्री को गिरफ्तार कर लेती।
मोंटगुमरी में अश्वेतों के साथ होने वाले इस अन्याय के खिलाफ पहली बार आंदोलन शुरू हुआ जिसका नेतृत्व मार्टिन लूथर किंग और उनके साथियों ने किया। अल्बामा से शुरू हुए इस जन आंदोलन का नेतृत्व करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने अश्वेत हिंसा का सहारा नहीं लिया। काले, गरीब लोगों को अमेरिकी संविधान के तहत बराबरी का हक दिलाने और उनकी गरीबी दूर करने का अपना सपना पूरा करने के लिए किंग ने गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह का सहारा लिया। उन दिनों अल्बामा के अलावा जॉर्जिया, मिसिसिपी और दक्षिण के अन्य राज्यों के अश्वेत लोगों को भारत के अछूतों की तरह रहना पड़ता था। उनके लिए सार्वजनिक स्थान पर अलग शौचालय थे, डिज्नी वर्ल्ड जैसे मनोरंजन स्थलों पर जाने की मनाही थी। उनके लिए अलग स्कूल थे और वे कम से कम वेतन वाली नौकरियां करते थे। नौकरी से निकाले जाने वालों में पहले अश्वेत ही होते थे।
मार्टिन लूथर किंग बुराई से लड़ने के लिए कौन से रास्ते अपनाते? उनके कई साथी मानते थे कि गरीबी से लड़ने का एक ही रास्ता कम्युनिज्म है लेकिन किंग एक धार्मिक व्यक्ति थे, वे पादरी थे और मानते थे कि कम्युनिज्म में ईश्वर के लिए कोई जगह नहीं, उनको यह पसंद नहीं था कि कम्युनिज्म इनसान की आजादी छीन लेता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए झूठ का सहारा लेने से कम्युनिस्ट संकोच नहीं करता, वह एक बेहतर रास्ता ढूंढ़ रहे थे, उन्होंने महात्मा गांधी का भाषण सुना जिन्होंने अहिंसा आंदोलन के जरिए १९४७ में ब्रिटिश शासकों को भारत से जाने के लिए मजबूर किया था। किंग की गांधी के समान आंदोलन की प्रमुख शर्त थी दुश्मन के खिलाफ हिंसक रास्ता नहीं अपनाना। किंग ने गांधी का ईसा मसीह रूप देखा। किंग ने सोचा जब गांधी के रास्ते से भारत आजाद हो सकता है तो अमेरिका में अश्वेत लोगों को उनके अधिकार क्यों नहीं दिलाए जा सकते? उन्होंने अहिंसा का रास्ता चुना क्योंकि अहिंसा कायरता नहीं है, उसे अपनाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए।
किंग का अहिंसा आंदोलन वाशिंगटन पहुंचा जहां उन्होंने प्रसिद्ध "आई हेव ए ड्रीम" (मेरा एक सपना है) भाषण में कहा, "मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब मेरे बच्चों को उनकी चमड़ी के रंग से नहीं देखा जाएगा बल्कि उनके चरित्र की गुणवत्ता से परखा जाएगा।" किंग ने बराबरी और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए पूरे अमेरिकी राष्ट्रवाद को चुनौती दी थी, जिसे स्वीकार किया राष्ट्रपति जानसन ने और सिविल राइट्स एक्ट और बाद में वोटिंग राइट्स कानून बनाकर अश्वेत समाज को अमेरिकी पहचान का हिस्सा बनाया। उसके थोड़े ही दिनों बाद अमेरिका में सबकी बराबरी का जनाधिकार (सिविल राइट्स) कानून लागू हुआ और अश्वेतों को वोट देने के अधिकार मिले। तब से अश्वेतों को नीग्रो कहना अपराध माना जाने लगा।
किंग ने २५ साल की उम्र में अहिंसा सत्याग्रह शुरू किया था और ३९ साल की उम्र में उनकी हत्या कर दी गई थी। आज वे ८० साल के होते। चालीस साल पहले किंग ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भेदभाव के कारण अमेरिका में एक अश्वेत आदमी राष्ट्रपति नहीं बन पा रहा था, जबकि अनेक अश्वेत लोग इस पद के योग्य हैं। उन्होंने संभावना व्यक्त की थी कि पचीस वर्ष बाद अमेरिका का राष्ट्रपति अश्वेत होगा। कुछ देर से ही सही अश्वेत ओबामा को व्हाइट हाउस पहुंचने में चालीस साल लग गए।गांधी के सत्याग्रह की तर्ज पर किंग ने जन अधिकार आंदोलन चलाया। अमेरिका के नेतृत्व की लड़ाई में ओबामा ने भी गांधी से प्रेरणा ली। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी हिलेरी को विदेश सचिव बनाया और मेकेन के पास सलाह-मशविरा के लिए गए। लिंकन मार्टिन लूथर किंग और गांधी की जीवन कथाओं ने ओबामा के व्यक्तित्व की रचना की ।अमेरिका ने रंगभेद के दायरे से बाहर जाकर ओबामा का नेतृत्व स्वीकार किया है।
देश की युवा पीढ़ी और मध्य वर्ग ने रंगभेद भूलाकर ओबामा का नेतृत्व स्वीकार किया है, जिससे कि मार्टिन लूथर किंग के सपने को रंगभेद के दायरे से बाहर देख कर नागरिक अधिकार के लिए कानून बनाए गए ।ओबामा ने अश्वेत वोट जीतने के लिए नस्लवाद का सहारा नहीं लिया। एक साल पहले उनके आलोचकों में अधिकांश अश्वेत लोग थे लेकिन जनवरी २००८ में श्वेत और अश्वेत लोगों में बदलाव लाने वाले ओबामा के महामंत्र में आशा की किरण दिखाई पड़ी और नए दौर की शुरुआत हुई। इसका सबूत मिला आयोवा प्रदेश में जहां के चुनाव में ओबामा को अधिकांश वोट मिले जबकि वहां अश्वेत लोगों की आबादी सिर्फ चार है। आयोवा का उदाहरण एक के बाद एक राज्यों का पथप्रदर्शक बन गया। इस स्थिति में अमेरिका एक अश्वेत राष्ट्रपति की प्रतीक्षा कर रहा था।
लेकिन ओबामा के राष्ट्रपति बनने से मार्टिन लुथेर किंग के सपने पुरे नही हुए हैं। व्हाइट हाउस में एक अश्वेत के बैठ जाने से अमेरिका के अश्वेत समाज की समस्याने दूर नही हो जाती। शिक्षा के शेत्र में अश्वेत लोग आज भी घटिया स्कूल में जाते हैं जैसे की किंग के जमाने में जाते थे। अश्वेतों में नशीले पदार्थों का सेवन गहराई से बैठा है और उससे जुड़ी अपराधिक समस्याएँ भी। अमेरिकी जेलों में अश्वेत लोगों की बढोत्तरी ऐसी ही एक समस्या है। कानून का पालन करने वाली अजेंसिओं के लिए काला होने शक के दायरे में दाल देता है। कह नही सकते के कानून के रखवाले का नजरिया कब बदलेगा? कह नही सकते की अश्वेत लोगों के साथ नौकरिओं में भेदभाव निकट भविष्य में खत्म हो जाएगा। यह भी नही कह सकते की मीडिया और हॉलीवुड में अश्वेत लोगों को अपराधी और चोर के रूप में पेश करने का सिलसिला कब बंद होगा?

किंग के माँ उनसे कहती थी: बेटा, तू किस्सी से कम नही। अब हर अश्वेत बालक की माँ कह सकती है: बेटा तू कुछ बनना तो ओबामा जैसा! इस अर्थ मैं किंग का सपना ज़रूर पुरा हुआ है।

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