Sunday, February 15, 2009

An enlightening evening with Kader Khan

Usually, I have found that the South Asian community hosts entertainment program featuring popular songs and dance performances, most of whom poor copies from Bollywood movies. On Valentine's Day of Ferurary 14, Holiday Inn owner, Gulshan Chhabra and Edison Councilman Dr. Sudhanshu Prasad invited me for an unusual program of Ghazal recitation by Kader khan, whom I have known as an actor and dialogue writer. To my surprise Khan used his deep theatrical voice to recite classical verses of Ghalib that, in spite of being popular, were full of difficult Persian and Urdu words. Undoubtedly, Ghalib remains a binding force for all South Asians, just like Amir Khusro, Iqbal, Kabir and Meerabai. Here is a brief report of Kader Khan's show:

Kader Khan, a legendary actor and writer of Hindi movies, enthralled the audience in Edison with his recitation of verses written by the classical Urdu and Persian poet of India, Ghalib, whose Ghazals remain popular not only in India and Pakistan but also amongst diaspora communities around the world. The program was organized on Valentine's Day at Holiday Inn hotel in Edison.

The audience thoroughly enjoyed the lines recited by Khan in his innovative style that were followed by performances by professional Ghazal singers, Shimble Raza and Ghulam Abbas. Khan said that he was happy to present Ghalib's poetry to the South Asian community of New Jersey on Valentine's Day, that was celebrated to spread the message of love. He, however, fell short of endorsing the way this event was celebrated in the West. “We must not divert from our traditions and culture and mistakenly express superficial affection for the opposite sex”, he cautioned. “Ghalib was a romantic person who deeply remained attached to traditions and social norms.”

Khan, who arrived in Edison from Canada, interpreted the lines for the benefit of non-Urdu speaking audience. The lines were simultaneously displayed on a lager screen during his recitation. “I would like you to feel the nuances of the great poetry of Ghalib before you burst into applause”, he commented laughingly.

Some of the lines that Khan recited included, “Dil-e-Nadan tujhe hua kya hai, Aakhir is marz ki dawa kya hai (O, innocent heart what is wrong with you, I am at a loss to find the remedy for this suffering!).”

Khan explained that he wanted to expose the South Asian communities in USA and Canada to their rich tradition of classical poetry of the past centuries. “We all are familiar with Ghalib's verses but don't fully grasp the in-depth meaning of words and symbols used by the poet”, he explained. He said that he planned to distribute printed copies of Ghalib's poems among his audience during his future shows.

Khan said that he was engaged in teaching Arabic and Urdu to the natives of India and Pakistan who were living in Dubai while he taught Hindi and Urdu to the Arabic speaking population.
Ghalib wrote his poetry during the fading phase of the Mogul empire and the tragic failure of 1957's mutiny against the British. His original name was Mirza Asadullah Beg who, following the tradition of classical Urdu poets, adopted the nick name, Ghalib. He was born on December 27, 1797 in Agra of parents with Turkish aristocratic ancestry.

Monday, February 9, 2009

क्या बुश को कठघरे में खड़ा करेंगे ओबामा

9 फरवरी 2009, नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
न्यू जर्सी से अशोक ओझा
अमेरिकी राष्ट्रपति का पद भार संभालते ही ग्वांतनामो बे और सीआईए की सभी गुप्त जेलों को एक साल के भीतर बंद करने का नीति निर्देश जारी कर बराक ओबामा ने अपने चुनावी वादों को पूरा किया है, लेकिन अमेरिका में यह विवाद शुरू हो गया है कि ग्वांतनामो को बंद करने से कहीं देश की सुरक्षा तो खतरे में नहीं पड़ जाएगी। रिपब्लिकन और कंजरवेटिव नेता यहां तक कहने लगे हैं कि ग्वांतनामो के खतरनाक कैदियों को अमेरिका की सिविलियन जेलों में भेजने से स्थानीय लोग असुरक्षित हो जाएंगे।
भूतपूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और उनकी तिकड़ी के सदस्य उपराष्ट्रपति डिक चेनी और रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने यातना के तौर-तरीकों के समर्थन में अपने अधिकारियों को गुपचुप आदेश जारी किए थे, जिनसे अब पर्दा उठ रहा है। चेनी ने यहां तक कहा कि उन्हें ग्वांतनामो में जांच-पड़ताल के लिए इस्तेमाल में लाए गए सभी तौर-तरीकों, खास तौर पर वॉटर बोर्डिन्ग के बारे में जानकारी थी। चेनी का मत है कि पूछताछ के इन तरीकों से ही अमेरिका को इतने सालों तक आतंकी हमलों से सुरक्षित रखा जा सका है। परोक्ष रूप से चेनी यह कहना चाहते होंगे कि अगर ओबामा सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में उनकी और बुश की बनाई नीतियों को बदलने की कोशिश की तो अमेरिका की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
9/11 के षड्यंत्र में शामिल और अल कायदा व तालिबान से जुडे़ तथाकथित आतंकवादियों पर 'एनमी कांबैटेंट' का ठप्पा लगा कर सैकड़ों लोगों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों से पकड़ा गया और अमेरिकी सीमा से बाहर कैद कर दिया गया। सालों तक इन कैदियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने की कोशिश में उन्हें यातनाएं दी गईं। इन यातनाओं में सबसे अधिक आपत्तिजनक थी वॉटर बोर्डिन्ग। कैदियों को यातना देने की यह ऐसी विधि है, जिसमें कैदी का सिर पानी में तब तक डुबाया जाता है जब तक कि वह सांस लेने के लिए व्याकुल न हो जाए और डूबने जैसा न महसूस करने लगे। अंतरराष्ट्रीय नियमों और जिनीवा कन्वेंशन के तहत वॉटर बोर्डिन्ग को यातना की प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है।
रिपब्लिकन और कंजरवेटिव खेमे के लोग ग्वांतनामो और सीआईए की गुप्त जेलों में कैदियों के साथ बरती जाने वाली यातना की खबरों को नजरअंदाज करते हुए आम लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगे हैं कि देखिए, इन उपायों के कारण ही 9/11 के बाद अमेरिका में कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ। अगर अंतरराष्ट्रीय कानून या जिनीवा कन्वेंशन को ताक पर रखकर अमेरिका को आतंकवाद से मुक्त रखा जा सकता है, तो इसमें बुराई क्या है। ऐसा कहकर वे न केवल बुश की नीतियों को सही ठहराना चाहते हैं, बल्कि यह भी साबित करना चाहते हैं कि बुश ने एफबीआई और सेना के जांच अधिकारियों को कैदियों से पूछताछ के लिए अत्यधिक बल प्रयोग की इजाजत देकर अमेरिकी संविधान का उल्लंघन नहीं किया।
ओबामा दुनिया में अमेरिका की छवि सुधारने के लिए वचनबद्ध हैं। भूलना नहीं चाहिए कि अमेरिकी सेनेट में ओबामा ने बुश को युद्ध करने का अधिकार देने के प्रस्ताव के विरुद्ध वोट किया था। उन्होंने अपने भाषणों में स्पष्ट किया है कि बुश की नीतियों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में धूमिल हुई अमेरिका की छवि को सुधारने का वे हर संभव प्रयास करेंगे। शपथ ग्रहण समारोह में ओबामा ने कहा था कि अपनी सैन्य ताकत के बल पर अमेरिका को मनमानी करने का हक नहीं है।
ग्वांतनामो के कैदियों को यातना देने की नीति को एक और झटका तब लगा, जब बुश के ही एक अधिकारी ने कबूल किया कि जिन कैदियों को यातना देकर सबूत जमा किए गए, उनके खिलाफ आतंकी होने का मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। ग्वांतनामो बे की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी एक अधिकारी सूसन क्राफोर्ड ने मोहम्मद अल कहतानी नामक कैदी के खिलाफ पूछताछ के तरीकों को अवैध करार देते हुए कहतानी के खिलाफ मुकदमा रोक देने की घोषणा की है। कहतानी 9/11 के विमान अपहरण में शरीक होने के लिए अमेरिका आना चाहता था, लेकिन उसे वीजा नहीं मिला। बाद में उसे अफगानिस्तान में पकड़ा गया और ग्वांतनामो लाया गया।
जांच निष्कर्ष में क्राफोर्ड ने कहा है कि सऊदी अरब के नागरिक को कई तरह से शारीरिक यातनाएं दी गईं। क्राफोर्ड के अनुसार ये क्रूर तरीके डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने मंजूर किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में फैसला दिया था कि रम्सफेल्ड के नेतृत्व में बना मिलिट्री कमिशन संविधान की भावनाओं के अनुरूप नहीं था और यह जिनीवा कन्वेंशन का उल्लंघन था।
क्राफोर्ड मानती हैं कि कहतानी एक खतरनाक मुजरिम है और उसे यूं ही नहीं छोड़ देना चाहिए, लेकिन यह निर्णय प्रेजिडंट ओबामा को करना होगा। ओबामा ग्वांतनामो को बंद करेंगे, लेकिन उन खतरनाक कैदियों के बारे में भी फैसला करेंगे जिनके खिलाफ संदेह पैदा करने वाले सबूत मौजूद हैं। ग्वांतनामो में अब 245 कैदी बचे हुए हैं, जिन्हें या तो उनके देश वापस भेजा जाएगा या उन्हें अमेरिकी जेलों में स्थानांतरित कर उन पर मुकदमे चलाए जाएंगे।
ओबामा को उन कानूनी पेचीदगियों को भी सुलझाना पडे़गा, जो बुश प्रशासन के दौरान हुई घटनाओं के कारण पैदा हुई हैं। यदि आधिकारिक तौर पर यह माना जाए कि ग्वांतनामो में कैदियों को यातना दी गई थी, तो सवाल उठेगा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। अगर ओबामा ने सचाई जानने के लिए जांच कमिटी बिठाई, तो उंगली जॉर्ज बुश की तरफ भी उठ सकती है। फिर शायद अबू गरीब का मामला भी उठे। सबूतों का सिलसिला अगर बुश तक पहुंचता है, तो सवाल उठेगा कि क्या ओबामा बुश को कठघरे में खड़ा होने पर मजबूर करेंगे?
फिलहाल तो ओबामा के सामने देश की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति सबसे अहम मुद्दा है। अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, जिससे राहत दिलाने के लिए ओबामा 850 अरब डॉलर की सरकारी राहत योजना कांग्रेस से पारित कराने में जुटे हैं। ऐसी स्थिति में पूर्व राष्ट्रपति को कानून के दायरे में ला पाना एक मुश्किल काम होगा। फिलहाल तो पेंटागन इस कोशिश में है कि ग्वांतनामो को बंद करने का टाइम टेबल कैसे तैयार किया जाए।

Wednesday, February 4, 2009

गांधी, मार्टिन लूथर किंग और ओबामा

Published in 31 Jan-2009 Print Edition of नईदुनिया
ओबामा के राष्ट्रपति बनने से मार्टिन लूथर किंग का सपना अभी पूरा नहीं हो गया है । बराबरी और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए पिछली सदी में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद को जो चुनौती दी थी वह आंशिक रूप में ही पूरी होती दिखाईदी है ।किंग का मानना था कि जिस संघर्ष की शुरुआत उन्होंने की है वह महात्मा गांधी के रास्ते पर चलते हुए ही सफल हो सकता है और वैसा मुमकिन होता जा रहा है ।

अशोक ओझा

संयोग ही है कि अमेरिका में अश्वेत लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए सत्याग्रह का बिगुल बजाने वाले नेता मार्टिन लूथर किंग के जन्मदिन के एक दिन बाद व्हाइट हाउस में अश्वेत प्रेसिडेंट ने प्रवेश कर देश का नेतृत्व संभाला।
चालीस साल पहले अश्वेत लोगों को बराबरी का हक दिलाने के लिए किंग ने असहयोग आंदोलन चलाया था। उन दिनों उनको नीग्रो कहा जाता था। अल्बामा प्रदेश के मोंटगुमरी नामक शहर में बस से सफर करने वाले अश्वेतों को आगे के दरवाजे से बस में आकर किराया देना पड़ता था, फिर नीचे उतर कर पिछले दरवाजे से बस में घुस कर अश्वेतों की सीट पर बैठना पड़ता था। अगर अश्वेत खंड में सीटें भर भी जाएं तो भी किसी अश्वेत यात्री को बस के अगले हिस्से में, जो श्वेत लोग की लिए आरक्षित होता था, बैठने की इजाजत नहीं थी, भले ही वे सीटें खाली क्यों न हों! यहां तक कि यदि बस के अगले हिस्से में सीटें भर गई हों और बस में कुछ और श्वेत लोग आ जाएं तो उनके लिए ड्राइवर अश्वेत यात्री को अपनी सीट से उठाने के लिए मजबूर करता था। उसके न उठने पर पुलिस बुलाई जाती जो अश्वेत यात्री को गिरफ्तार कर लेती।
मोंटगुमरी में अश्वेतों के साथ होने वाले इस अन्याय के खिलाफ पहली बार आंदोलन शुरू हुआ जिसका नेतृत्व मार्टिन लूथर किंग और उनके साथियों ने किया। अल्बामा से शुरू हुए इस जन आंदोलन का नेतृत्व करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने अश्वेत हिंसा का सहारा नहीं लिया। काले, गरीब लोगों को अमेरिकी संविधान के तहत बराबरी का हक दिलाने और उनकी गरीबी दूर करने का अपना सपना पूरा करने के लिए किंग ने गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह का सहारा लिया। उन दिनों अल्बामा के अलावा जॉर्जिया, मिसिसिपी और दक्षिण के अन्य राज्यों के अश्वेत लोगों को भारत के अछूतों की तरह रहना पड़ता था। उनके लिए सार्वजनिक स्थान पर अलग शौचालय थे, डिज्नी वर्ल्ड जैसे मनोरंजन स्थलों पर जाने की मनाही थी। उनके लिए अलग स्कूल थे और वे कम से कम वेतन वाली नौकरियां करते थे। नौकरी से निकाले जाने वालों में पहले अश्वेत ही होते थे।
मार्टिन लूथर किंग बुराई से लड़ने के लिए कौन से रास्ते अपनाते? उनके कई साथी मानते थे कि गरीबी से लड़ने का एक ही रास्ता कम्युनिज्म है लेकिन किंग एक धार्मिक व्यक्ति थे, वे पादरी थे और मानते थे कि कम्युनिज्म में ईश्वर के लिए कोई जगह नहीं, उनको यह पसंद नहीं था कि कम्युनिज्म इनसान की आजादी छीन लेता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए झूठ का सहारा लेने से कम्युनिस्ट संकोच नहीं करता, वह एक बेहतर रास्ता ढूंढ़ रहे थे, उन्होंने महात्मा गांधी का भाषण सुना जिन्होंने अहिंसा आंदोलन के जरिए १९४७ में ब्रिटिश शासकों को भारत से जाने के लिए मजबूर किया था। किंग की गांधी के समान आंदोलन की प्रमुख शर्त थी दुश्मन के खिलाफ हिंसक रास्ता नहीं अपनाना। किंग ने गांधी का ईसा मसीह रूप देखा। किंग ने सोचा जब गांधी के रास्ते से भारत आजाद हो सकता है तो अमेरिका में अश्वेत लोगों को उनके अधिकार क्यों नहीं दिलाए जा सकते? उन्होंने अहिंसा का रास्ता चुना क्योंकि अहिंसा कायरता नहीं है, उसे अपनाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए।
किंग का अहिंसा आंदोलन वाशिंगटन पहुंचा जहां उन्होंने प्रसिद्ध "आई हेव ए ड्रीम" (मेरा एक सपना है) भाषण में कहा, "मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब मेरे बच्चों को उनकी चमड़ी के रंग से नहीं देखा जाएगा बल्कि उनके चरित्र की गुणवत्ता से परखा जाएगा।" किंग ने बराबरी और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए पूरे अमेरिकी राष्ट्रवाद को चुनौती दी थी, जिसे स्वीकार किया राष्ट्रपति जानसन ने और सिविल राइट्स एक्ट और बाद में वोटिंग राइट्स कानून बनाकर अश्वेत समाज को अमेरिकी पहचान का हिस्सा बनाया। उसके थोड़े ही दिनों बाद अमेरिका में सबकी बराबरी का जनाधिकार (सिविल राइट्स) कानून लागू हुआ और अश्वेतों को वोट देने के अधिकार मिले। तब से अश्वेतों को नीग्रो कहना अपराध माना जाने लगा।
किंग ने २५ साल की उम्र में अहिंसा सत्याग्रह शुरू किया था और ३९ साल की उम्र में उनकी हत्या कर दी गई थी। आज वे ८० साल के होते। चालीस साल पहले किंग ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भेदभाव के कारण अमेरिका में एक अश्वेत आदमी राष्ट्रपति नहीं बन पा रहा था, जबकि अनेक अश्वेत लोग इस पद के योग्य हैं। उन्होंने संभावना व्यक्त की थी कि पचीस वर्ष बाद अमेरिका का राष्ट्रपति अश्वेत होगा। कुछ देर से ही सही अश्वेत ओबामा को व्हाइट हाउस पहुंचने में चालीस साल लग गए।गांधी के सत्याग्रह की तर्ज पर किंग ने जन अधिकार आंदोलन चलाया। अमेरिका के नेतृत्व की लड़ाई में ओबामा ने भी गांधी से प्रेरणा ली। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी हिलेरी को विदेश सचिव बनाया और मेकेन के पास सलाह-मशविरा के लिए गए। लिंकन मार्टिन लूथर किंग और गांधी की जीवन कथाओं ने ओबामा के व्यक्तित्व की रचना की ।अमेरिका ने रंगभेद के दायरे से बाहर जाकर ओबामा का नेतृत्व स्वीकार किया है।
देश की युवा पीढ़ी और मध्य वर्ग ने रंगभेद भूलाकर ओबामा का नेतृत्व स्वीकार किया है, जिससे कि मार्टिन लूथर किंग के सपने को रंगभेद के दायरे से बाहर देख कर नागरिक अधिकार के लिए कानून बनाए गए ।ओबामा ने अश्वेत वोट जीतने के लिए नस्लवाद का सहारा नहीं लिया। एक साल पहले उनके आलोचकों में अधिकांश अश्वेत लोग थे लेकिन जनवरी २००८ में श्वेत और अश्वेत लोगों में बदलाव लाने वाले ओबामा के महामंत्र में आशा की किरण दिखाई पड़ी और नए दौर की शुरुआत हुई। इसका सबूत मिला आयोवा प्रदेश में जहां के चुनाव में ओबामा को अधिकांश वोट मिले जबकि वहां अश्वेत लोगों की आबादी सिर्फ चार है। आयोवा का उदाहरण एक के बाद एक राज्यों का पथप्रदर्शक बन गया। इस स्थिति में अमेरिका एक अश्वेत राष्ट्रपति की प्रतीक्षा कर रहा था।
लेकिन ओबामा के राष्ट्रपति बनने से मार्टिन लुथेर किंग के सपने पुरे नही हुए हैं। व्हाइट हाउस में एक अश्वेत के बैठ जाने से अमेरिका के अश्वेत समाज की समस्याने दूर नही हो जाती। शिक्षा के शेत्र में अश्वेत लोग आज भी घटिया स्कूल में जाते हैं जैसे की किंग के जमाने में जाते थे। अश्वेतों में नशीले पदार्थों का सेवन गहराई से बैठा है और उससे जुड़ी अपराधिक समस्याएँ भी। अमेरिकी जेलों में अश्वेत लोगों की बढोत्तरी ऐसी ही एक समस्या है। कानून का पालन करने वाली अजेंसिओं के लिए काला होने शक के दायरे में दाल देता है। कह नही सकते के कानून के रखवाले का नजरिया कब बदलेगा? कह नही सकते की अश्वेत लोगों के साथ नौकरिओं में भेदभाव निकट भविष्य में खत्म हो जाएगा। यह भी नही कह सकते की मीडिया और हॉलीवुड में अश्वेत लोगों को अपराधी और चोर के रूप में पेश करने का सिलसिला कब बंद होगा?

किंग के माँ उनसे कहती थी: बेटा, तू किस्सी से कम नही। अब हर अश्वेत बालक की माँ कह सकती है: बेटा तू कुछ बनना तो ओबामा जैसा! इस अर्थ मैं किंग का सपना ज़रूर पुरा हुआ है।