क्या भारत सेंटिनल द्वीप के सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा करने में समर्थ है?
-अशोक ओझा
अमेरिकी धर्म प्रचारक जॉन एलन चाऊ की मौत कोई सामान्य घटना नहीं है। यह अमेरिका के ईसाई धर्म प्रचारकों और धर्मान्तरण के उद्देश्य से दूर दराज़ के देशों में जाने का हिम्मत रखने वाले के उस सुनियोजित प्रयास की विफलता है, जिसके लिए वे सदियों से कार्य करते रहे हैं। इन सबके लिए भारी धनराशि बटोरी जाती है और दुनिया के ऐसे स्थान ढूंढें जाते हैं, जहाँ के लोग दूर दूर तक ईसाई धर्म से परिचित नहीं या जिनका धर्म परिवर्तित करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। जितना दुर्गम स्थान उतना ही प्रचारक के लिए चुनौती, लेकिन बढ़ी चुनौती झेलने वाले प्रचारकों की प्रतिष्ठा उनके समाज उतनी ही में बढ़ती है। इसीलिए नोर्थ सेंटीनल द्वीप में जॉन एलन चाऊ की मौत को उसके समुदाय में, धर्म प्रचारकों के समाज में कुछ लोग 'शहादत' मानते हैं। इतिहास बताता है कि दक्षिण अमेरिका के दुर्गम देशों में कोलंबस के पीछे पीछे ईसाई धर्म प्रचारक गए, और ईसाई धर्म का प्रचार सदियों तक कुछ इस तरह किया कि पश्चिमी गोलार्द्ध में अनेक देशों की मूल प्रजातियाँ सदा के लिए समाप्त हो गयीं।उत्तरी अमेरिका में हज़ारों वर्षों पुरानी सुसंस्कृत इंडियन जातियाँ अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के साथ विलुप्त हो गयीं। स्थानीय लोगों को 'सभ्यता' सिखाने के नाम पर ईसाई बनाया गया। सदियों तक चले इस अभियान में अनेक जातियां नष्ट हो गयीं, लेकिन धर्म प्रचारकों का अभियान समाप्त नहीं हुआ। इसीलिए आज भी वे गैर-ईसाइयों, आदिवासियों, और जन जातियों, वनजातियों को 'सभ्यता' सिखाने के लिए 'धर्मान्तरण' का शुभ कार्य करते रहते हैं। अब चीन का ही उदहारण लें। ये प्रचारक चीन में अपना मिशन सफल बनाने के लिए लम्बे समय से कार्यरत हैं, लेकिन वहां की सरकार की सतर्कता से उन्हें अभी तक निराशा ही हाथ लगी है। लेकिन इसी निराशा को भविष्य में सफलता का रूप देने की लिए जॉन जैसे ईसाई मिशनरी, जिन्हें 'इवांजलिकल' कहा जाता है, चुनौतीपूर्ण मिशन पर जाने के लिए सर पर कफ़न बाँध कर भी तैयार हो जाते हैं जैसे किसी युद्ध में जा रहे हों।
जॉन जैसे मिशनरी अपने कार्यों से अपने समाज की न केवल प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं, बल्कि बाइबिल में अंकित 'ग्रेट कमीशन' का अक्षरशः पालन भी करते हैं। 'ग्रेट कमीशन' के अंतर्गत ईसा मसीह हर ईसाई धर्मावलम्बी से अपील करते हैं कि अपने धर्म के प्रचार के लिए आगे आओ और सुसमाचार ('गॉस्पेल') का प्रचार करो। 'ओ, 'ग्रेट कमीशन' के पालनहार, तुम जहाँ भी जाओ, चाहे वह तुम्हारा पड़ोस हो, या गैर मुल्क हो, उन अभागे लोगों से मिलो जिन्हें ईसा मसीह के सुसमाचार ('गॉस्पेल') का ज्ञान नहीं। ईसा मसीह के अनुयायियों! अपने हर छोटे बड़े कदमों से समस्त देशों में ईसा मसीह के भक्त तैयार करो!'
'ग्रेट कमीशन' की तैयारी के लिए जॉन एलेन चाऊ को सघन प्रशिक्षण दिया गया। न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार उसे केंसास प्रदेश के किसी ग्रामीण इलाके में आँखों पर पट्टी बाँध कर ले जाया गया, जहाँ उसे अंग्रेज़ी न समझने वाले लोगों का नाटक करने वाले धर्म प्रचारकों के बीच ईसाइयत का प्रचार करना था। ये लोग वैसे ही थे जैसे नार्थ सेंटिनल के वासी-आक्रामक मुद्रा हाथ में आदिम किस्म के भाले-तीर लिए द्वीप वासियों से घिरा था जॉन, सुसमाचार देने के लिए। उसकी कर्मठता, उसक जूनून उसे इस बात के लायक बना रही थी कि वह अंडमान से ३५ मिल दूर स्थित 'नार्थ सेंटिनल' द्वीप ज़रूर जाए और जो कार्य तीन सौ साल में मिशनरी ना कर पाए, उसे कर गुज़ारे। अंडमान का नोर्थ सेंटिनेल द्वीप एक प्रतिबंधित इलाक़ा है जहाँ भारतीय भी नहीं जा सकते । इनसे किसी को भी संपर्क करने की इजाज़त नहीं है और उन्हें 'अनकॉन्टैक्टेड ट्राइब्स' भी कहा जाता है ।
इस प्रकार भारत के लिए जो इलाका, जहाँ की आबादी पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कटी हुई है, ऐसी सांस्कृतिक धरोहर पर विदेशी धर्म प्रचारक का आक्रमण यह संकेत देता है कि वह धरोहर खतरे में हैं। सेंटिनल जनजाति के लोगों की संख्या मात्र 50 से 150 के क़रीब ही रह गई है । वहां के निवासी ठण्ड जैसी बाहरी बीमारी से भी अपनी रक्षा कर पाने में सक्षम नहीं, उन लोगों की सुरक्षा के लिए भारत सरकार के पास योजना है? यदि नार्थ सेंटिनल पर आने जाने वालों के बारे में भारतीय नौ सेना या तट-रक्षक दल खोज खबर रख पाने में असमर्थ है, उसे अपनी कमजोरी न देख कर मछुआरों को, जिन्होंने जॉन एलिन को अवैध रूप से द्वीप तक पहुंचाया था, पकड़ना सही मानते हों तो वे उन पचास-सौ लोगों की हज़ारों वर्ष पुरानी संस्कृति की रक्षा कैसे कर पाएंगे?
नार्थ सेंटिनल द्वीप से जॉन एलन चाऊ का शव उठा लाना संभव न हो पाया है, लेकिन जॉन ने अन्य प्रचारकों को सन्देश जरूर दे दिया है। मिशनरी अपने लक्ष्य पर पहुँचने की बार बार कोशिश करते हैं, तब तक कोशिश करते रहेंगे, जब तक उसमें सफल न हो जाएँ। जॉन अपने समाज में ईसा मसीह की सेवा करते करते 'शहीद' हो चुका है।उसके माता पिता उसकी शहादत के प्रति शायद गौरव का अनुभव कर रहे होंगे। उन्होंने गिरफ्तार मछुआरों को मुक्त करने के मांग भी की है, और जॉन की मौत के लिए किसी को दोषी नहीं मानते। जॉन के अनुयायी और भी होंगे, जो उसकी जमात को धन की कमी नहीं होने देंगे। वे इस मिशन को अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य भी बना सकते हैं।
जॉन एलिन शाओ की मौत हो चुकी है, मगर उनके अवैध ढंग से सेंटिनल द्वीप पर जाने से सेंटिनेल जनजाति और उन जनजातियों के भी अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है, जिनके संपर्क में वह आया था। ऐसा नहीं कि सभी ईसाई धर्म प्रचारक आक्रामक तरीके से धर्म प्रचार करना चाहता हैं।ऐसे धर्म प्रचारक भी हैं जो शांतिपूर्ण तरीकों से इन लोगों की सेवा करना चाहते हैं। भारत के करोड़ों लोग 'जेहोवा विटनेस' नमक धर्म प्रचारक संस्था के सदस्य हैं, ये लोग स्थानीय लोगों के रहन सहन में कोई दखल देना चाहते। वे चुपचाप ईसा मसीह के संदेशों का प्रचार करते रहते हैं। न्यू जर्सी के मिड्ल सेक्स काउंटी कॉलेज में मैं एक पूरा सेमेस्टर 'जेहोवा विटनेस' के सदस्यों को हिंदी पढ़ा चुका हूँ। मेरा अनुभव कहता है कि उनका पूरा उद्देश्य हिंदी सिखने पर था, धर्म प्रचार पर नहीं।
लेकिन सोचना यह है कि इक्कीसवीं सदी में भारत के जंगल और दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाले लोगों को बाहरी धर्म प्रचारकों से कैसे बचाएं और उनकी रक्षा करें। हालां कि पश्चिमी धर्मावलंबी कहीं भी जाकर धर्म प्रचार करने में सक्षम है। उसने उत्तर पूर्व में नागालैंड से लेकर मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में ईसाइयत का प्रचार करने का सामर्थ्य दिखाया है। लेकिन धर्म प्रचार एक बात है और 'नार्थ सेंटिनल' जैसे इलाकों में चोरी छिपे आक्रमण की मुद्रा में प्रवेश करना एकदम अलग बात। अगर भारतीय पुलिस और सेना उन पर नज़र नहीं रख सकती तो पुरातत्व और विरासत के रखवालों के लिए प्रश्न पूछने का समय आ गया है।
('नया ज्ञानोदय' के जनवरी २०१९ अंक में प्रकाशित)
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