Sunday, January 5, 2014

सितम्बर २०१३ में मेरे दिल्ली प्रवास के अनुभव

 दिल्ली की बदलती तस्वीर 
            (यह लेख सितम्बर २०१३ में मेरे दिल्ली प्रवास के दौरान अनुभवों पर आधारित है। )

'दिल्ली में डेंगू से अब तक एक हज़ार सात सौ मरे ....' दिल्ली की एक दस मंजिली इमारत में बालकनी में बैठे बैठे जब यह समाचार पढ़ रहा हूँ, तीन मच्छर काट चुके हैं। इमारत के पड़ोस में डी डी ए का खुला मैदान है जिसमे पानी जमा रहता है, झाड़ियाँ उग आयी हैं, उनमें  सफ़ेद रंग के जहरीले फूल खिले हैं। सरकार के स्वास्थ्य अधिकारी कहीं दिखाई नहीं देते। पड़ोस के बच्चे स्कूल जाने के बदले इसी मैदान में खेलते हैं। पास के डी डी ए पार्क की दीवारों पर पेड़ों के छाये तले बैठे हैं १० से १२ साल के बच्चे-इनके हाथों में प्लास्टिक की छोटी थैलियाँ हैं जिनमे सफ़ेद रंग के द्रव्य भरे हैं। थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें चूसते रहते हैं। पास की इमारत के गार्ड बताते हैं--प्लास्टिक की थैलियों में संभवतः घरों को पेण्ट करने वाले पदार्थ या, मोटर टायर के पंक्चर ठीक करने वाला रसायन होता है, जिन्हें चाटने से नशा होता है। कभी कभी ये बच्चे झाड़ियों में एकत्र हो कर नशा करते हैं। दिल्ली के इस इलाके में मकानों की कीमत करोड़ों में है। करोड़ों की इमारतें, डेंगू फ़ैलाने वाले मच्छर, और नशा करते किशोर सब पास पास रहते हैं।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार दिल्ली सहित पूरे भारत में लोगों की आय बढ़ रही है, मध्यम वर्ग फैल रहा है, मकानों की कीमतें असमान पर हैं। लेकिन अर्थशास्त्री इस बात की चर्चा नहीं करते कि डेंगू फैलाने वाले मच्छर कितने लोगों को मरते हैं। मंत्री की चिंता है अस्पतालों में डेंगू से पीड़ित लोगों के लिए अधिक बिस्तर तैयार करने की, शहर को साफ़ सुथरा बनाने की बात कोई नहीं करता। मरते हुए इनसान किसी को झकझोरते नहीं, न सरकारी तंत्र को, न ही आन्दोलनकारियों को-डेंगू एक सामाजिक सत्य है जिसे पनपते हुए देखने की आदत दिल्लीवासियों को हो चुकी है। 

नुक्कड़ पर बने मदर डेरी की दूकान पर दूध खरीदने वाले लोगों की अनुशासित लम्बी लाईन लगी है। दूकान के पिछवाड़े में कल रात होटल वाले ने ठेले वाले ने बचा हुआ चावल और नूडल की ढेर फ़ेंक दी थी उसे एक अधेड़ औरत और एक किशोर खंगालते रहे हैं! इसका  क्या करेंगे? डेरी के एक कर्मचारी ने बताया: ये लोग इसे सूअरों को खिलाएंगे। मैं राहत की सांस लेता हूँ यह सोच कर कि होटल का फेंका हुआ भोजन इन्सान के नहीं, पालतू पशुओं के काम आएगा। शायद दिल्ली प्रगति कर रहा है, लेकिन देश में अभी भी ऐसे लोग हैं जो जूठन में अपना भोजन तलाशते नज़र आते हैं।

लाल किले के निकट पुरानी दिल्ली की बस्ती में पैखाने और पेशाब की बदबू फेंफड़े को भर देती है। पास की गली में अंडे और टालते हुए भोजन की दूकानों की कतार--मेरे मित्र ने कहा अन्दर दूर तक गन्दगी, बदबू, और भीड़ के दमघोटूं माहौल में रहते हैं लाखों लोग, जिनमें अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय के हैं, हालां कि अल्पसंख्यकों की खारख्वाह बनाने वाले राजनेताओं की कमी नहीं। विश्वास नहीं होता कि यह भारत की राजधानी है और इन्हीं रास्तों से गुजरते हैं भारत के प्रधान मंत्री प्रति वर्ष १५ अगस्त को भारत का राष्ट्रीय ध्वज लाल किले पर फहराने के लिए।

पिछले कई दिनों से चर्चा है भूतपूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह के उस वक्तव्य की जिसमें उन्होंने खुलाशा किया कि कश्मीरी नेताओं को भारतीय सेना चुपके से पैसे देती थी ताकि वे भारत के समर्थक बने रहें। देश हित में बहुत कुछ होता रहता है, जिसे लोगों को बताया नहीं जाता। जैसे सी आई ए अफ़गानिस्तान, इराक और अन्य देशों में राजनेताओं को धन दिया करती है। इसका भांडा फूटा लेकिन अमेरिका की विदेश नीति पर कोई असर नहीं हुआ। देश इस विवाद में लिपटा है कि पूर्व सेनाध्यक्ष को गुप्त सैनिक गतिविधियों पर टिपण्णी करनी चाहिए थी या नहीं, उधर सीमा पार से आतंकवादियों ने हमला कर दिया और ११ सैनिक शहीद हो गए। देश इन हमलों का इतना आदी हो चुका है कि कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, बस मरने वालों की गिनती कर ली जाती है। देश इन खबरों से आक्रोषित नहीं होता, शायद आक्रोषित होते होते थक चूका है। थक चूके हैं मेट्रो स्टेशनों पर बन्दूक ताने सुरक्षा कर्मी आतंकियों की प्रतीक्षा करते हुए। जीवन चलता रहता है, मेट्रो से बाहर की तरफ और बाहर से मेट्रो स्टेशन की ओर।

कनाट प्लेस के महंगे होटलों में अँधेरे कोनों में मुंह सटाए युवक युवतियां शराब की चुस्कियां ले रहे हैं। दोपहर तीन बजे युवा पीढ़ी के ये सदस्य किसी कम्पनी में नौकरी नहीं कर रहे होंगे, शायद कॉलेज में पढ़ते हों, और कक्षा में जाने के बदले प्रेम के महंगे पेंग लगाने के लिए होटल का यह कोना चुन होगा। 'हैप्पी आवर' में 'बाई वन गेट वन फ्री' का नारा युवा पीढ़ी को शराब की लत लगाने के लिए कारगर साबित हो रहा है। राजधानी में अमीर वर्ग की नयी पीढ़ी से काफी उम्मीदें हैं।


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