कैलिफोर्निया के कांग्रेसमैन एड रोयस कैपिटल हिल में भारत समर्थक जन प्रतिनिधियों के गुट, 'इंडिया कौकस' के उपाध्यक्ष हैं. ऐसे व्यक्ति का अमेरिकी कांग्रेस में होना भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है. भारत और भारतवंशियों के समर्थन में बने कांग्रेस के कॉकस का मुख्य उद्देश्य अमेरिका में बसे भारतीयों के हितों को कैपिटल हिल में व्यापक समर्थन दिलाना है. कॉकस की स्थापना सन १९९३ में न्यू जर्सी के डेमोक्रेट फ्रैंक पल़ोन ने की थी था जिसमे डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं. एक दशक पहले जब भारत द्वारा अणु बम परीक्षण के कारण अमेरिका ने व्यापारिक प्रतिबन्ध लगा दिया था तब उस प्रतिबन्ध को उठाने में एड रोयस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी और २००६ में ऐतिहासिक आणविक सहयोग समझौता करने में भारत का पक्ष सफलता पूर्वक अमेरिकी कांग्रेस में पेश किया था. यही नहीं, २००८ में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उन्होंने कांग्रेस में प्रस्ताव पारित कराया कि पाकिस्तान को आतंकवाद से विमुख करने के लिए यदि अमेरिका द्वारा हर संभव प्रयास ना किये गए तो दक्षिण एशिया सहित पूरी दुनिया की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी.
अमेरिकी कांग्रेस में भारत विशेषज्ञ माने जाने वाले रोयस का भारत समर्थन पी चिदंबरम के पाकिस्तान विरोध से ज्यादा मुखर है. इसीलिए पिछले दिनों जब अमेरिका के विभिन्न शहरों से भारतीय सामाजिक संस्थाओं का प्रतिनिधिमंडल कैपिटल हिल पहुंचा तो उनके सामने एड रोयस नामक अमेरिकी जन प्रतिनिधि जोशीला भाषण करने के लिए खड़ा था. तालियाँ बजीं और रोयस के साथ फोटो खिचाने के लिए भारतीय डाक्टरों, होटल मालिकों और १५ अगस्त पर भव्य परेड आयोजित कराने वालों की ऐसी भीड़ लगी कि समारोह की कार्रवाई ठप्प पड़ गयी. अफ़सोस की बात यह थी कि शिकागो, न्यू यॉर्क, टेक्सास, और कैलिफोर्निया से आये वरिष्ठ भारतीयों को संबोधित करने के लिए वहां एड रोयस के सिवा अमेरिकी कांग्रेस का कोई और महत्वपूर्ण जन प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था. भारत के राजदूत कहे जाने वाले ये भारतीय कैपिटल हिल के बैंक्वेट हॉल में जब समोसे खाने में जुटे थे उस समय उनका साथ देने के लिए एक भी कांग्रेसमैन उपस्थित नहीं था. एड रोयस भी जा चुके थे.
प्रति वर्ष अमेरिका में बसे लगभग भारतीय मूल के सफल और समृद्ध लोगों का दल राजधानी वाशिंगटन का दौरा करता है जिसके दौरान उनकी मुलाकात जन प्रतिनिधियों के अलावा व्हाईट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ होती है. कहा जाता है कि इस दौरे से अमेरिकी सरकार पर भारतीय हितों के समर्थन में अनुकूल वातावरण और दबदबा बनता है. उदाहरण के तौर पर बुश प्रशासन द्वारा नुक्लियर समझौते की बात कही जाती है. उन दिनों प्रमुख भारत वंशियों ने सांसदों के घर घर जाकर भारतीय पक्ष के समर्थन में माहौल बनाया था. वाशिंगटन के डाक्टर राजन आनंद ने इस तथ्य को भारतीय राजदूत निरुपमा राव के सामने उस समय प्रस्तुत किया जब कैपिटल हिल और व्हाईट हाउस में दिन भर कवायद करने के बाद भारतीय सामाजिक नेताओं के सम्मान में नव नियुक्त राजदूत ने भोज का आयोजन किया और विधिवत इस बात का जिक्र किया था कि भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों को मजबूत बनाने में अमेरिका के भारत वंशियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. यानि कैपिटल हिल में जो काम भारत सरकार को करना चाहिए वह काफी हद तक यहाँ बसे भारतीय कर लेते हैं.
कैपिटल हिल के बाद भारतीयों के प्रतिनिधिमंडल का दूसरा पड़ाव था व्हाईट हाउस जहाँ उनसे मिलने के लिए ओबामा प्रशासन के युवा अधिकारियों को तैनात किया गया था. एक सौ भारतीयों को राष्ट्रपति के प्रशासनिक भवन तक जाने दिया गया जहाँ भारतीय मूल के युवा अधिकारी अपने भाषणों के जरिये अपनी प्रतिभा का परिचय देते दिखाई दे रहे थे. उनकी बातों से जाहिर हो रहा था कि समोसे खा कर सम्बन्ध बढाने की तकनीक पुरानी हो चुकी है. ओबामा के मुख्य टेक्नोलौजिकल अधिकारी अनीस चोपड़ा ने सैम पित्रोदा का नाम लिया जिन्होंने भारत में संचार के आधुनिकतम संसाधनों का जाल बिछा दिया है, जिसकी बदौलत राष्ट्रपति ओबामा अजमेर के सुदूर गाँव वालों की दास्तान मुंबई में बैठ कर सुन चुके थे. चोपड़ा जैसे भारतीय मूल के अनेक युवा अधिकारी ओबामा प्रशासन को भारत के विकास से साथ सीधे जोड़ते हैं. इस काम के लिए राजदूतों की आवश्यकता नहीं. इन्टरनेट और ४ जी नेटवर्क के जरिये अमेरिका में सक्रिय व्यापारी आंध्र के गाँव में पानी की व्यवस्था करने की रूपरेखा बना सकता है. सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले भारतीयों को अगर सरकारी अधिकारी परेशान न करें तो विकास में लगने वाली राशि भ्रष्ट अफसरों की जेब में नहीं जायेगी. तभी अमेरिकी तकनीक और भारतीय प्रतिभा का प्रयोग विकास कार्यों में हो सकता है.
अमेरिका के सम्बन्ध मजबूत करने के लिए पुरानी पीढ़ी के संपन्न डाक्टरों और होटल मालिकों से ज्यादा नयी पीढ़ी के भारत वंशियों की बातें सुनने के लिए भारतीय समुदाय को तैयार होना पड़ेगा. जन प्रतिनिधियों के साथ फोटो खिचाना घिसी पिटी भारतीय परंपरा तो हो सकती है, आधुनिक प्रगति की पहचान नहीं बन सकती. यह बात राजदूतावासों के अधिकारियों को भी बताना ज़रूरी है जो भारतीय समुदाय की वास्तविक समस्याओं पर सार्वजनिक चर्चा करने के बजाय भोज समरोहों का आयोजन कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं.
अमेरिकी प्रशासन के अनेक विभागों में विविध समुदाय से जुड़ने की परियोजनाए चल रही हैं. हार्वर्ड प्रशिक्षित अनीस यदि ओबामा की आर्थिक नीतियों को कारगर बनाने में टेक्नोलोजी का सफल प्रयोग कर रहे हैं तो उप राष्ट्रपति जो बैडन के साथ कार्यरत युवा अधिकारी अदिति कुमार ८१४ बिल्लियन डॉलर की निर्माण परियोजनाओं को अमल में लाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. दूसरी तरफ अकिल वोहरा एशियाई मूल के अमेरिकी जनता के साथ निकट सम्बन्ध बनाने के लिए ओबामा की सलाहकार समिति में वरिष्ठ सलाहकार हैं जब कि मितुल देसाई विदेश विभाग (स्टेट डिपार्टमेंट) में हिलरी क्लिंटन को दक्षिण एशिया की नीतियों पर सलाह देने का काम कर रहे हैं. तकनीकी विकास की दिशा में अदिति कुमार की भूमिका कुछ इस तरह समझी जा सकती है कि ८१४ बिल्लियन डॉलर की धन राशि जिन संगठनो को दी जाती है उनसे तीन महीने के भीतर यह सूचना देने के लिए कहा जाता है कि परियोजना से कितने लोगों को काम मिला और स्थानीय स्तर पर विकास का स्वरुप क्या रहा. इन आकंड़ों को कुमार के डेटा बेस में जमा कर उनका विश्लेषण किया जाता है कि कहीं कोई सूचना अधूरी और गलत न भारी गयी हो. इस प्रक्रिया से विकास में लगे प्रत्येक डॉलर का प्रतिफल मालूम किया जाता है. क्या भारत सरकार राज्यों को भेजने वाले आर्थिक अनुदान का पूरा हिसाब रखती है? अगर ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश को सरकारी स्वास्थ्य परियोजनाओं को दी जाने वाली करोड़ों की राशि भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाती और एक के बाद अनेक सरकारी डाक्टरों की हत्याएं न होतीं.