भारतीय व्यापारिओं को घाटे का सौदा करना नहीं आता. जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था 'आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया' के आतंरिक विरोधाभाष का शिकार है, भारतीय मूल के व्यापारिओं ने मंदी के इस बुरे वक्त में भी मुनाफा कमा कर दिखा दिया. चाहे जितनी मंदी हो, अमेरिकी लोगों को सुबह की काफी के लिए ७-११ या डंकिन डोनाट्स जाना पड़ेगा. गाडी में तेल, जिसे यहाँ गैस कहते हैं, भरने के लिए एक्सन के पम्प पर जाना पड़ेगा और हाईवे पर शाम हो गयी तो मोटेल में रात बितानी ही पड़ेगी. इन सभी धंधों का मालिक ज्यादातर भारतीय हैं.
भारतीय समाज के अधिकांश सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त हैं. वे विभिन्न व्यवसायों में नाम, धन, और यश प्राप्त कर चुके हैं. अमेरिकी समाज हमारी लगन और प्रतिभा का कायल है. हमारे इंजीनियर इसलिए सफल हैं कि वे लम्बे समय तक मेहनत करने से कतराते नहीं. हमारे सॉफ्टवेर डेवेलेपरों पर भी यही बात लागू होती है. हमारे बच्चे इसलिए मेधावी हैं कि वे अपने परिवार के संस्कार से मजबूती से जुड़े हैं और अबतक अमेरिकी समाज की बुरी आदतों से बचे हुए हैं. और यह सभी बातें अमेरिका में बसे भारतीयों को एक मानक समुदाय का दर्जा देती हैं.
लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जब भी अपने हितों की रक्षा के लिए एक जूट होने की बात आती है, हम हिन्दुस्तानी एकता का परिचय देने से पिछड़ जाते हैं. पिछले दो वर्षों में न्यू जर्सी में कुछ जाने माने भारतीयों की निर्मम हत्या हुई. ब्रिजवाटर शहर के डॉ सिन्हा और हेमिल्टन के समृद्ध व्यापारी अर्जुन द्यापा की असामाजिक तत्वों द्वारा हत्या कर दिए जाने के बाद पुलिस प्रशासन पर दबाव डालने के लिए सशक्त वातावरण नहीं बन पाया. इसका कारण सिर्फ यह था कि आजीविका और व्यापार में लीन भारतीय बंधू इन घटनाओं को अपना न समझ सके. ऐसे अनेक मामले पैदा होते हैं और मिट जाते हैं. भारतीय समाज के प्रति होने वाली दुखद घटनायें या भेदभाव के मामले उतनी गंभीरता से नहीं लिए जाते जितने कि अन्य समुदायों से जुड़े मामले.
भारत की तरह अमेरिका में भी भारतीय लोगों के बीच एकता की भावना ढूंढे नहीं मिलेगी. हम सब तिरंगा फहराने और ‘याद करो क़ुरबानी’ गीत गाने के लिए एकत्र तो होते हैं, लेकिंन हम अपनी पहचान बनाते हैं अपने मूल प्रदेश यहाँ तक कि जातियों के नाम पर. अमेरिका में ब्रह्मण, रेड्डी, जाट, पटेल, मलयाली, तेलुगु आदि के नाम पर संगठनों की कोई कमी नहीं, मगर भारतीयता के नाम पर संस्थाओं का नितांत आभाव है. अगस्त का महीना भारत की आजादी की वर्षगांठ मनाने का समय होता है. लेकिन इस वर्ष होने वाले कार्यक्रम विवादों के घेरे में कैद हो गए. न्यू जर्सी के एडिसन और इसलिन शहरों के भारतीय व्यापारियों ने जुलूस निकालने के लिए दोनों शहरों की गलियों के बंटवारे तक कर डाले. स्वतंत्रता की सालगिरह मनाने वाले दो गुटों में बाँट गए. मामला अदालत में गया. यहाँ तक की एडिसन की मेयर ७० वर्षिया बुज़ुर्ग महिला टोनी रिसिग्लियानो ने दोनों गुटों में समझौता करने की कोशिश की. वे भी असफल रहीं. अदालती कार्यवाही से थक कर दोनों गुटों ने दो अलग अलग जुलूस निकाले. लोगों का उत्साह दोनों गुटों के परस्पर महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया.
समाज में व्यापारी वर्ग, विशेषतः गुजराती मूल के व्यापारियों, का बोल बाला है. इसमें दो राय नहीं कि प्रमुख व्यापारी राजनितिक मसलों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं. प्रदेश के एकमात्र भारतीय मूल के विधायक और डेमोक्रेट उमीदवार उपेन्द्र चिवुकुला पिछले पांच चुनावों में विजयी होते आये हैं. निर्विवाद रूप से चिवुकुला को भारतीय समाज के सभी वर्गों, धर्मों, और राजनीतिक विचारों वाले मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है. जब उन्हें भारतीयों द्वारा दो स्वतंत्रता दिवस परेड मनाने के बारे में पता चला तो चिवुकुला व्याकुल हो गए और सभी पक्षों से एकता की अपील की.
न्यू जर्सी अमेरिका का वह प्रदेश है जहाँ विगत दस वर्षों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या में लगभग दुगनी वृद्धि हुई है. इस प्रदेश में रह कर न्यू यॉर्क शहर में नौकरी करना आसान हो जाता है. न्यू जर्सी के एडिसन शहर की तीस प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है. दस साल पहले शहर की मुख्य सड़क ओक ट्री रोड पर गिनी चुनी दूकानों के अलावा सन्नाटा छाया रहता था. यही हाल पड़ोस के वुडब्रिज शहर का भी था. लेकिन आज इस सड़क का नज़ारा कुछ और ही है. घरेलू ज़रुरत के सभी सामान यहाँ की दूकानों पर मिल जाते हैं. इस इलाके की शोहरत इतनी बढ़ गयी है कि 'लिटिल इंडिया' के नाम से जाने जाने वाली इस बस्ती में न्यू यॉर्क से लेकर वर्जीनिया तक के लोग खरीदारी करने आते हैं. भारतीय भोजन का आनंद लेना हो या शादी के कपड़े खरीदने हों, ओक ट्री रोड से बेहतर जगह पूर्वी अमेरिका में शायद ही कोई और हो!
इसलिन बाज़ार में सन नब्बे के दशक में भारतीय दूकानदारों की बड़ी मुसीबत थी. बदमाशों के गैंग अक्सर दूकानों के शीशे तोड़ देते थे. लोग सड़क पर टहलने में संकोच करते थे. दूकानों के भाव बढ़ते नहीं थे. लेकिन आज नज़ारा कुछ और ही है. रियल स्टेट मार्केट इस कदर महंगा हो गया है कि इसलिन में दूकान किराये पर लेना न्यू यॉर्क शहर में जगह खरीदने जैसा है. नगर का आर्थिक विकास तेज़ी से हुआ है. यह अपने आप में एक ऐसी खबर है जो भारतीयों के उद्यमी होने का सच्चा सबूत पेश करती है. खुद वुडब्रिज के मेयर जॉन मककार्मिक ने कुछ दिन पहले कहा था कि आज उनके शहर का आर्थिक विकास इसलिन के भारतीय दूकानों के कारण संभव हुआ है. अपने शहर में भारतीयों की प्रगति को देखते हुए मेयर ने इसलिन की लिटल इंडिया बस्ती का नाम 'इंडिया स्क्वायेर’ रख दिया.
यहाँ के भारतीयों को इस बात पर गर्व करना चाहिए कि अमेरिकी समाज में उन्हें इज्ज़त के साथ देखा जाता है. कैलिफोर्निया, न्यू योर्क और टेक्सास के साथ न्यू जर्सी में भारतीयों की संख्या सर्वाधिक है. चीनी और फिलिप्पिनो समुदाय के बाद हम तीसरे बड़े समुदाय हैं. हमारी आमदनी किसी भी दूसरे समुदाय से ज्यादा है. इन सबके बावजूद भारतीयों को सरकारी विभागों में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं. वह तब तक नहीं मिल सकता जब तक कि भारतीय मूल के लोग अपनी राष्ट्रीय एकता का परिचय न दे. अपनी पहचान प्रदेश और क्षेत्रीयता के बजाय अपने देश से जोड़ें. सामाजिक एकता के आभाव में भारतीय समुदाय को मिला ‘आदर्श अल्पसंख्यक समुदाय’ का ख़िताब किसी काम का नहीं.